कुछ मेरे बारे मे...

फ़ॉलोअर

Blogger द्वारा संचालित.
सोमवार, 14 सितंबर 2015

ज़मीर

हम तो दफ़न कर देते है इसे अपनी सहूलियतों के हिसाब से,
अंधेरों में ही सही लेकिन मैं हूँ इसका अहसास देता है ये,
क्यों नहीं है मुस्कुराने का वक़्त हमारे पास,
हमें अपनी क़द्र करने का वक़्त देता है ये,
कभी गुनाह से पहले, कभी गुनाह के बाद,
जाग कर अपने वज़ूद का सबूत देता है ये,
गर मानते है हम हर बात इसकी,
खुद में खुदा होने सा अहसास देता है ये,
नहीं देता है ये हमें कभी धोखा,
गलत होने पर ज़रूर टोकता है ये,
क्यों बेच देते है हम इसे चंद खुशियों के लिए,
ईमानदार कोशिशों से मुफ्त में मिलता है ये,
हम क्यों इसे मारते है अपनी खामोशियों से इसे,
ये ही तो है जो हमारी रूह को सुकून देता है ,
मेरे ज़मीर इस मतलबी दुनिया में माना की है मुश्किल,
जगा कर रख सकू तुझे ऐसी राह खोज रहा हूँ मैं.…



मंगलवार, 28 जुलाई 2015

धन्यवाद कलाम सर...

डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम नहीं रहे । २७ जुलाई  २०१५ एक ऐसा दिन है जिस दिन भारत ने एक सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रपति, एक अद्भुत वैज्ञानिक, एक महान शिक्षक और एक सरल इंसान को खोया है । मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि मैं उनके युग का हिस्सा बना हूँ । कलाम सर एक ऐसे व्यक्ति थे जिनका जीवन, जिनके विचार, जिनका व्यवहार सब कुछ प्रेरणादायी था ।
जब वो राष्ट्रपति बने थे तब मेरे मन में एक विचार आया था कि, क्या यह व्यक्ति वाकई राष्ट्रपति बनने लायक है या सिर्फ पोखरण के सफल परिक्षण का इनको इनाम दिया गया है?? फिर जब मैंने सर को पहली बार ध्यान से सुना तो मैं दंग रह गया था कि भारत में अभी भी ऐसे लोग  मौजूद है और वो इतने बड़े पद पर आ सकते है? मैं शर्मिंदा महसूस कर रहा था कि मेरा आकलन कितना गलत था ।
जब वो राष्ट्रपति थे और भारतीय राजनीति और राजनीतिज्ञों पर बेबाक टिप्पणी करते थे तब मैं हमेशा ये सोचता था कि ये व्यक्ति शायद दुबारा राष्ट्रपति न बन पाये क्योंकि ये राजनीतिज्ञों को बेबाकी से आइना दिखा देता है और हुआ भी कुछ ऐसा ही । मुझे बहुत दुःख हुआ था कि आखिर क्यों भारतीय जनता को इतना अधिकार नहीं है की वो अपना राष्ट्रपति खुद चुन सके क्योंकि अगर ऐसा होता तो आज भी वो हमारे माननीय राष्ट्रपति होते ।
सर एक कर्मशील व्यक्ति थे और उनकी हमेशा से ये इच्छा थी की उन्हें एक शिक्षक के रूप में लोग याद रखे न की एक पूर्व राष्ट्रपति के रूप में । उनकी ज्ञानार्जन की ये प्रबल इच्छा ही थी जिसके कारण वो अपने अंतिम समय में वही कर रहे थे जो वो चाहते थे । एक शिक्षक ये लिए इससे अच्छा अंत क्या हो सकता है की वो एक शिक्षण संस्थान में पढ़ाते हुए अपनी अंतिम सांस ले । जाते-जाते भी वो हमें ये शिक्षा दे गए की अगर आप अपना काम ईमानदारी से कर रहे हो तो ईश्वर भी आपकी इच्छओं का ध्यान रखता है ।
कलाम सर ने न सिर्फ हमें एक विज़न दिया है अपितु हमें उस विज़न को पाने का रास्ता भी दिखाया है । अब हमारी बारी है की हम मिल कर उनके विज़न पर काम करे और २०२० तक उनके विज़न को साकार करने की दिशा में कदम उठाएं । हम सब कुछ भले न कर पाये लेकिन ये शपथ ले की हमसे जितना हो सकेगा हम अपने देश को अपने समाज को देने की कोशिश करेंगे ।
अंततः  वो एक वट वृक्ष है जिसने अपनी शाखाओं को इतना मजबूत कर लिया है की वो कभी गिर ही नहीं पायेगा । 
शनिवार, 17 मई 2014

अच्छे दिन आ सकते है???

इलेक्शन हो गए और अबकी बार मोदी सरकार भी बन गयी।  हमें मोदी जी को बधाई देनी चाहिए, इसलिए नहीं की वो देश के नए प्रधानमंत्री बनने वाले है बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने एक लॉन्ग टर्म विज़न के साथ एक असंभव सा दिखने वाला काम कर दिखाया है।  १९८४ के बाद इस देश की राजनीति ने बहुत अस्थिरता देखी है। इस देख ने लगातार चुनाव झेले भी है।  श्री अटल बिहारी वाजपाई जी ने एक प्रयास किया था सबको साथ रख कर सरकार चलने का जिसमे वो तो पूरी तरह सफल नहीं हो पाये थे लेकिन उनसे सीख कर कांग्रेस ने ये काम १० सालों तक किया।  मोदी जी ने कांग्रेस के इन १० सालों के शासन को बहुत करीब से देखा है और हमें उनकी सोच की दाद देनी चाहिए की उन्होंने कांग्रेस की गलतियों को बड़ी बारीकी से न सिर्फ समझा साथ ही उनका सही फायदा भी उठाया और इसी के चलते उनकी पहली कोशिश ये थी की बहुमत को भाजपा खुद हासिल करे। आज जब क्षेत्रीय दल अपनी बेजा डिमांड के परेशान करते है ऐसे समय मोदी जी की ये सोच एकदम सही है।
इस बार जो सरकार बनी है उसमे यूपी, राजस्थान, गुजरात, एमपी, छत्तीसगढ़, दिल्ली और उत्तराखंड की महती भूमिका रही है।  इन ७ राज्यों ने भाजपा को १७० के करीब सीट्स दी है। दिल्ली, उत्तराखंड, गुजरात और राजस्थान में तो कोई और दल अपना खाता भी नहीं खोल पाया है जो की एक अभूतपूर्व बात है।  अब मोदी जी को दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनाने की कोशिश करना चाहिए ताकि अगले इलेक्शन में वहाँ के क्षेत्रीय दलों का भी सफाया हो जाए और भारत में मजबूत सरकार बनाने का जो रास्ता मोदी ने री-ओपन किया है वो हमेशा खुला ही रहे।
भारत एक बहूत विशाल लोकतंत्र है और क्षेत्रीयता के आधार पर वोट मांगने वालों की यहाँ  भरमार है।  मुझे कभी-कभी बहुत दुःख होता है ये देख कर की कैसे मिली-जुली सरकार में ये दल अपना उल्लू सीधा करते है और वोटर उल्लू बना सब देखता रहता है और फिर अगले इलेक्शन में वही गलती दोहराता है। मोदी जी ने भाजपा को २७२ से ज्यादा सीट्स दिलवाकर ये एक बहुत अच्छा काम किया है।  मुझे उम्मीद है की ये भाजपा सरकार (एनडीए सरकार नहीं ) अच्छा काम करें।  मुझे डर लगता है इनके कुछ साथियों से क्योंकि उनका बौद्धिक स्तर सभी लोग अच्छे से जानते है। अब बस भाजपा को इनके दबाव में न आ कर अच्छा काम करना है ताकि अगले इलेक्शन में इनकी भी जरुरत न पड़े।
कांग्रेस के बारे में बोलना पता नहीं सही है या नहीं क्योंकि उनके हवाई किलों के ध्वस्त होने के बाद भी उनको अक्ल आती है या नहीं ये बता पाना थोड़ा मुश्किल ही है। मैं एमपी का हूँ और अच्छी तरह जानता हूँ की अगर यहाँ के चुनावों में यही के एक नेता की थोड़ी भी दखलंदाज़ी वोटर को दिख जाती है तो यहाँ का वोटर बिदक जाता है और भाजपा को वोट दे देता है। अगर कांग्रेस को वापस आना है एमपी में तो फिर उस नेता की इस प्रदेश में एंट्री बैन करनी होगी नहीं तो शायद अगले १० साल भी कांग्रेस यहाँ नहीं आ सकती है।
 अब कांग्रेस को एक गहरे और वास्तविक आत्ममंथन की जरुरत है।  अगर सही में राहुल जी में उनका भविष्य का प्रधानमंत्री दिखता है तो उन्हें उस दिशा में बहुत  वास्तविक प्रयास अभी से शुरू करने पड़ेंगे।  सबसे  पहले तो राहुल जी को जिम्मेदार बनना पड़ेगा। इस देश के बच्चे को भी समझ आ गया है की कैसे कुछ कांग्रेसी नेतओं ने राहुल जी के आस पास एक भ्रम जाल बना रखा है और वो उनका सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे है।  राहुल जी को ये समझना  पड़ेगा की पहले कांग्रेस ने उनको "युवराज" बनाया तभी मोदी जी ने उनको "शहज़ादा" बनाया।  मोदी जी ने पहले काम किया और दिखाया भी लेकिन आप तो पिछले १० सालों से जिम्मेदारी से भाग रहे थे।  आपके पास मौके थे की आप राजनीति का ककहरा इन १० सालों में सीख सकते थे लेकिन आप तो बस युवराज बने रहे।
राहुल जी को सोचना चाहिए की क्यों जनता आप पर भरोसा नहीं कर पायी। मुझे जो कारण नज़र आ  तो यही है की मनमोहन जी को खुल कर काम नहीं करने दिया गया और सोनिया जी के कन्धों पर बन्दूक रख कर कांग्रेस के कई नेताओं ने उनका शिकार किया।  सारे दल ये बोलते रहे की  मनमोहन जी का जी का रिमोट सोनिया जी के पास है लेकिन असल में वो रिमोट कांग्रेस के कई नेताओं ने सोनिया जी के नाम से इस्तेमाल किया है। अब अगर आपको पीएम बनना है तो भाजपा से सीख लेनी होगी की आप कांग्रेस को सत्ता में नहीं लोगे कांग्रेस को ये एकजुट कोशिश करना पड़ेगी की आपको वो पीएम बनवाए।  आपको एक ऐसी टीम बनानी होगी जो आपके लिए काम करे।  भाजपा के सारे नेता मोदी जी को पीएम बनाने में जुट गए थे और कांग्रेस के सारे नेता आपके भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए थे की ये हमको सत्ता दिलवाएगा और आप लगातार जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।
खैर जो भी हो  अभी तो "अबकी बार मोदी सरकार" और एक आम आदमी (सच्ची वाला ) होने के नाते हम ये उम्मीद करते है कि "अच्छे दिन आ जाये..."

मंगलवार, 6 मई 2014

राजनीति - राजनीति

आजकल के इस चुनावी माहौल मे कई लोगों के कई रंग देखने को मिल रहे है।  जैसे पिछले दिनों शुरू हुई नमो और प्रियंका कि ही ज़ंग देख ले।  मुझे ऐसा लग रहा है कि मुझे ये सब कुछ अपने नज़रियें से भी देखना चहिये कि कौन कैसा है।  मैं एक अदना सा आम आदमी हूँ ( सच्ची मुच्ची वाला आम आदमी "आम आदमी पार्टी" वाला नहीं :) )  और मुझे भी ये सोचने का हक़ है कि मेरे देश की राजनीति ओर जा रही है।
भाजपा ने प्रधानमंत्री पद लिये श्री नरेन्द्र मोदी जी को प्रस्तुत किया है और मोदी जी के पास एक अच्छा राजनैतिक अनुभव भी है । मेरे हिसाब से ये अनुभव उन्हे बहुत फ़ायदा दिला सकता है या यूं  कहे कि दिला रहा है।  लेकिन उनके द्वारा किये कुछ कटाक्ष मुझ जैसे आम आदमी को उनसे दूर भी कर देते है।  हाल ही में जब प्रियंका जी ने " नीच राजनीति" शब्द का प्रयोग किया तब मेरे आम दिमाग मे ये बात आयी कि वो "निम्न या निचले या स्तरहीन राजनीति" की बात कर रही है लेकिन मोदी जी ने उस बात को जातिगत मोड़ दे दिया।  मुझे आश्चर्य है कि विकास के नाम पर सरकार को हर समय घेरने वाले और विकास के नाम पर वोट मांगने वाले व्यक्ति को जातिगत सहानभूति क्यों चाहिए??? या फिर उनको भी लगता है कि हम लोग सिर्फ़ जाति आधारित वोट करते है?? वैसे मोदी जी ने स्मृति ईरानी का  सही उपयोग किया है।  यदि वो जीती तो मोदी को एक बड़े कॉम्पिटिटर कि टेंशन खत्म हो जाएँगी और स्मृति जी से उन्हे राजनैतिक खतरा तो है नहीँ कि उनको बड़ा पद देना पड़े और पड़ा भी तो किसी आयोग का प्रमुख बना देंगे और हार गयीं तो गुज़रात मे जो सालों पहले स्मृति ज़ी ने बोला था उसका हिसाब लेने का मौका मिल जायेगा।  याने चित भी मेरी और पट भी मेऱी। वैसे स्मृति जी से पूछना चाहिए की "चांदनी चौक" से हारने के बाद वो वहाँ कितनी बार गयी थी और अगर गयी थी तो वहाँ से दूबारा चुनाव लड़ने कि हिम्मत क्योँ नहीं जुटा पाई?
मुझे आश्चर्य होता है भाजपा के कई नेताओं पर कि वो या तो पार्टी की अंधरुनी राजनीति क शिकार हो रहें है या अति-आत्मविश्वास उन्हे ले डूब रहा है । जेटली जी इसका एक बड़ा उदाहरण है क्योंकि ज़ीवन भर दिल्ली की राजनीति मे रहने के बाद अपना पहला लोकसभा चुनाव अमृतसर से लड़ने का क्या तुक है??????
राहुल जी कि जितनी बात की जाये कम ही है।  देश की सबसे पुरानी पार्टी मे  नंबर २ की हैसियत रखते है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर खुद कि पहचान नहीं बना पाए है अब तक।  मुझे जो कारण नज़र आये है जिनके चलते राहुल जी कि राह मुश्किल है, उनमे के प्रमुख है उनकी अनुभवहीनता।  मुझे लगता है जब यूपी या दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुये थे तब उन्हे खुद को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने चाहिए था और यदि यूपी मे इस आधार पर कि "आप मुझे जिताओ और राज्य का मुख्यमंत्री बनवाओ", कांग्रेस यूपी मे अपना खोया जनाधार वापिस पा सकती थी लेकिन आप तो शह्जादें नहीं नही युवराज हो और ये युवराजगीरी आपको अब ले डूब रही है।  यूपी में तो कांग्रेस के पास अभी अच्छा नेतृत्व भी नहीं है।  दिल्ली में तो शीला जी नहीं जमने देंगीं।
अब बात करें केजरीवाल जी की। केजरीवाल जी एक ऐसे शख्स है जिन्होने इस देश की जनता में एक नयी उम्मीद जगाई और जगा कर बुझा भी दी।  एक मौका मिला था काम करने का उस मौके को अपने बालहठ के चलते गवां दिया।  वैसे उनका नरेंद्र मोदी जी को टक्कर देने क प्रयास काबिल ए तारीफ़ है लेकिन अब नाकाफ़ी है क्योंकि जनता मे उनकी भगोड़े वाली छवि बन गयी है।
मेरे मन में कुछ सवाल ऐसे है जिनके जवाब मुझे शायद ही कभी मिले, जैसे, "नरेंद्र मोदी दो जगहों से क्यों लडे, क्या इसका सही कारण वो कभी बता पाएंगे???" या "नरेंद्र मोदी सुरक्षित सीट से ही चुनाव क्योँ लडे, क़्या उन्हे हार जाने का  डर है????" । "राहुल गांधी ने मौका होते हुये भी अनुभव लेने कि कोशिश क्यों नहीं की ???" या "उनके अपने नहीं चाहते की वो कोइ अनुभव ले???"।
  मुझे लगता है कि मोदी जी को अति-आत्मविश्वास से, राहुल जी को चाटुकार लोगों से और केजरीवाल जी को दोनों से बचने की जरुरत है । मोदी जी जाति पर नहीं विकास पर वोट मांगिये क्योंकि अगर किसी भी कारण से "अबकी बार मोदी सरकार" नहीं बन पायी तो आपकी वापसी मुश्किल हो जायेगी, आडवाणी जी का हश्र तो आप देख ही चुके है । राहुल जी अब आपकी पार्टी का जाना तय है तो आत्ममंथन करें और अपनी पार्टी के कुछ बड़बोले लोगों से सावधान रहें । केजरीवाल जी आप चने के झाङ पर चढ़ना बन्द कर दें और हकीकत की दुनिया मे रह कर काम करें ।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

Irresponsible or not responsible

लोकसभा चुनाव चल रहे है । देश में अलग-अलग लहरें भी चल रही है । हर दल को उसके नेता की लहर नज़र आ रही है । तरह-तरह के अघोषित प्रायोजित ओपिनियन पोल भी समाचार चैनलों पर आ रहे है । कुल मिला कर हम अभी चुनाव में घिरे हुए है ।
मैंने सोचा की चलो कुछ चुनाव से सम्बन्धित ही खोजे तो मैंने खोजना चालू किया कि आखिर एक सांसद की उसके संसदीय क्षेत्र के प्रति जिम्मेदारियां क्या होती है? जब मैं खोज रहा था तब मुझे लोकसभा की वेबसाइट भी देखने को मिली जिसमे कही पर भी इस बात का कोई जिक्र नहीं था की एक सांसद किन बातों के लिए जिम्मेदार है और ये देख कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ की लोकसभा भी ये बताने को तैयार नहीं है की उसके सदस्यों की क्या जिम्मेदारियां है । वैसे इस खोज में मुझे टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक खबर जरूर मिल गयी जिसमे लिखा था कि आर टी आई कार्यकर्ता श्री देव आशीष भट्टाचार्य के द्वारा मांगी गयी जानकारी से ये पता चला है कि विधानसभा या संसद सदस्यों की उनके क्षेत्र के प्रति कोई जिम्मेदारियां नहीं होती है ?????????
मैं हर बार वोट देता हूँ और इसे अपनी जिम्मेदारी मानता हूँ लेकिन जब इस तरह की खबरें पढ़ने को मिलती है तो मुझे लगता है की मेरे वोट का कोई अर्थ है क्या, क्योंकि जिसे मैं चुन रहा हूँ वो मेरे प्रति कहीं पर भी लिखित में जिम्मेदार नहीं है । वैसे ऐसा होता भी है, मैं भोपाल संसदीय क्षेत्र में रहता हूँ और मुझे यकीन है की मेरे मौजूदा सांसद मेरे क्षेत्र में कभी नहीं आएं होंगे । आज मैं मौजूदा सांसद या इस चुनाव में खड़े किसी भी प्रत्याशी से मेरे क्षेत्र की बात करने जाओ तो मुझे यकीन है वो मेरे क्षेत्र के बारे में कुछ भी नहीं जानते होंगे ।
जनता को वोट देना चाहिए और ये उसका अधिकार और कर्त्तव्य है फिर चाहे वो विकास के लिए पार्षद से लेकर सांसद के बीच झूलता ही क्यों न रहे । मुझे ये लगता है की पार्षद से लेकर सांसद तक सब की जिम्मेदारियां तय होना चाहिए की आपको इतना और ये काम तो करना ही है नहीं तो आप अगली बार चुनाव नहीं लड़ पाएंगे और साथ ही साथ जिस तरह हम कम उपस्तिथी के चलते परीक्षा नहीं दे पाते है वैसे ही जनप्रतिनिधियों की भी उपस्तिथी की गणना होनी चाहिए ।
मैं शायद सपना ही देख रहा हूँ क्योंकि जो मैं चाहता हूँ वो संभव नहीं है और जो ये बोलता है की नहीं ये संभव है वो या तो मुझे मुर्ख समझता है या खुद को मुर्ख साबित करना चाहता है । कोई बिल्ली अपने गले में घंटी नहीं बंधना चाहती है ।
शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अवसरवाद

आज की तारीख में अवसरवादिता हर जगह पर है क्योंकि सभी को यही सिखाया जा रहा है कि जो भी अवसर मिले बस पकड़ लो, सही है या गलत ये तो बिलकुल मत सोचो । अभी कुछ दिन पहले जब मैंने देखा कि राम विलास पासवान ने एन डी ए का दामन थाम लिया है तो मैंने कहा कि ये अवसरवादिता का एक बड़ा उदाहरण है । पासवान ये जानते है कि अब यू पी ए कि वापसी सम्भव नहीं है और भाजपा का सत्ता में आना लगभग तय है तो क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लिए जाए और मंत्री पद पक्का कर लिया जाए । वैसे पासवान ये करने वाले पहले व्यक्ति नहीं है फ़ारुक़ अब्दुल्ला ये काम पहले से करते आ रहे है । नेताओं के ये कदम कही से भी अप्रत्याशित नहीं है बस दुःख तो ये देख कर होता है कि बिना ईमान के ये नेता संसद तक क्यों पहुँच जाते है ?
बॉलीवुड में भी अवसरवादिता किस तरह से फैली है ये तो आप किसी भी अखबार या न्यूज़ चैनल ( वैसे आज कल ये न्यूज़ चैनल को न्यूज़ चैनल ना बोलते हुए व्यूज चैनल बोला जाना चहिये।) के माध्यम से पता लगा सकते है  और न्यूज़ चैनल तो अवसरवाद में राजनीतिज्ञों को पीछे छोड़ना चाहते है ।
खेलों में भी आप अवसरवादिता को आसानी से देख सकते हो और उसका ताज़ा उदाहरण है धोनी का एशिया कप न खेलना । लगातार हार के कलंक से बचने के लिए ही धोनी ने ये कदम उठाया है । हम लगातार हार रहे है और धोनी को ये मालूम है कि हम अभी और हारेंगे क्योंकि हमने कोई तैयारी नहीं की है तो क्यों ना चोट का बहाना ही बना लिया जाए । वैसे धोनी को कितनी चोट लगी है ये अब पता चल ही रहा है क्योंकि बी सी सी आई ने सर्वोच्च न्यायालय में ये अपील की है कि खिलाड़ियों के नाम सार्वजनिक न किये जाए ।

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

वो बच्चा

काफ़ी साल पहले की बात हैं, मैं किसी काम से न्यू मार्केट गया था । अपना काम निपटाने के बाद जब मैं वापस आया तो देखा कि एक बच्चा हाथ में एक कपडा लिए सब गाड़ीवालों से पूछ रहा था कि "भैया गाड़ी साफ़ कर दूँ .. " और इसी क्रम में वो मेरे पास भी आया और मुझसे भी पूछा कि "भैया गाड़ी साफ़ कर दूँ क्या?"। उन दिनों मेरी गाड़ी नयी थी और मैं रोज़ जब भी घर से निकलता था गाड़ी साक करके ही निकलता था तो मैंने उससे पूछा कि "क्यों, मेरी गाड़ी साफ़ नहीं दिख रही है क्या तुझे?" ।
वो बच्चा बोला,"भैया करवा लो ना बस २ रूपये लूंगा।" इसके बाद मेरी और उसकी बातचीत कुछ ऐसी हुई थी -
मैं - "क्या करेगा २ रूपए का?"
बच्चा - "काम है थोड़ा सा"
मैं - "काम बता तो हो सकता है मैं गाड़ी साफ़ करवा लूँ "
बच्चा - "माँ ने बोला है कि शाम तक १० रूपये का आटा घर लेकर ही आना और जितनी जल्दी पैसे इकट्ठे करूँगा उतनी जल्दी घर जा कर आटा दे दूंगा और खेलने चला जाऊंगा "
बच्चा - "भैया अब तो करवा लो ना "
मैं - "पढ़ने जाते हो क्या?"
बच्चा - "हाँ भैया दूसरी में पढता हूँ "
मैं - "चल मेरे साथ…"
फिर मैं उसे दुकान पर ले गया और उसको १ किलो आटा दिलवा दिया । आटा दिलाने के बाद मैंने उससे पूछा "कुछ खाना है क्या?"
वो बच्चा बोला "नहीं भैया ये आटा ही बहुत है"और ये बोलता हुआ कि," भैया मैं जाता हूँ मेरे दोस्त मेरा इंतज़ार कर रहें होंगे" वो भागते हुए आखों से ओझल हो गया ।
उस दिन शायद पहली बार मुझे ये समझ आया कि "अच्छा करने से अच्छा लगता है :)"

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

समाज के बदलते स्वरुप का आइना

आज उसने एक पत्रिका की एक कहानी पढ़ी । वैसे तो वक़्त होते हुए भी वक़्त न होने की दुहाई देते हुए वो अख़बारों में छपी लघुकथाएं तो पढ़ लेता था लेकिन बड़ी कहानियां पढ़ने में उसे कोफ़्त होती थी । पत्रिकाओं को पढ़ने का शौक उसे उसके पिता से विरासत में मिला था और कभी कभी लिखने कि कोशिश भी वो कर लिया करता था । आज उसने जो कहानी पढ़ी थी उस कहानी में उसको कही ना कहीं निराश सा कर दिया था क्योंकि वो कहानियों से एक अच्छे सन्देश कि उम्मीद लिए पढ़ने बैठा था । आज कि कहानी में उसे कोई अच्छा सन्देश नज़र नहीं आया था । 
वो सोच रहा था कि इस कहानी कि नायिका के द्वारा की गयी प्रतिक्रिया उसको गलत लगी या इस कहानी को लिखने वाली महिला कि सोच उसे गलत लगी थी । इस कहानी कि नायिका एक सांवली सी ठीक-ठाक दिखने वाली लड़की है जिसकी २ सहेलियां है, एक सहेली जो कि बहुत ख़ूबसूरत है और एक जो देखने में अच्छी है और नायिका को अपनी बहुत ख़ूबसूरत सहेली से कहीं ना कहीं ठोड़ी सी चिढ है क्योंकि सब उन दोनों कि तुलना करते रहते है । 
कहानी पढ़ने के बाद वो कहानी के एक हिस्से के बारे में बार-बार सोच रहा था । कहानी के उस हिस्से में नायिका अपनी सहेली कि शादी में जाती है जहाँ उसे अपनी सहेली के पति का एक दोस्त दिखता है और उससे उसकी शादी कि बात भी चलने वाली है । नायिका जो कि इस बात से डरी होती है कि कही वो लड़का उसकी जगह उसकी दूसरी सहेली जो कि बहुत खूबसूरत है उसको न पसंद कर ले उस पार्टी में वाइन का एक लार्ज गिलास गटक कर (कहानी की भाषा के अनुसार) बहुत कुछ ऐसा बोलती है जो की संस्कारों कि श्रेणी में नहीं आना चाहिए । यहाँ पर उस कहानी कि लेखिका "ये जवानी है दीवानी" से प्रेरित सी लगती है क्योंकि वो "झल्ली" जैसे शब्दों का इस्तमाल करती है अपनी दुल्हन बनी दोस्त के लिए । 
कहानी पढ़ने के बाद वो सोच रहा था कि क्या अपनी अच्छी सहेली कि शादी में इस तरह हंगामा करना वो भी नशे में सही था? क्या अपनी उस सहेली को अप्रत्यक्ष रूप से कोसना जो कि नायिका को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती है सही था? क्या उस लड़के द्वारा नायिका को इस तरह कि हरकत से बाद पसंद करना सही था? अगर सही था तो क्यों सही था क्योंकि अपने परिवार और परिचितों के सामने तो किसी भी तरह का नशा करना गलत ही होता है चाहे वो हाई सोसाइटी के नाम से ही क्यों ना हो रहा हो और साथ ही स्लैंग का इस्तमाल दोस्तों में न करते हुए सभी के सामने करना भी गलत ही है और कहानी में ये कहीं भी नहीं था कि नायिका हाई सोसाइटी से है । 
वो अब इसी उधेड़बुन में था कि क्या हम उस नायिका कि व्यथा को और बेहतर ढंग से पेश नहीं कर सकते थे???

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

ख़राब दिन

आज का दिन ही ख़राब था । सुबह-सुबह की भाग-दौड़ के बाद ऑफिस पहुंचा कि थोड़ा जल्दी आ कर थोड़ा समय इंटरनेट पर कुछ खबरें पढ़ लूंगा तो पता चला कि ऑफिस का इंटरनेट बंद था और सुधरने में थोड़ा समय लग जायेगा । सोचा कि मोबाइल पर ही देख लें तो मोबाइल का इंटरनेट भी नहीं जुड़ पा रहा था । अचानक चारों तरफ से आवाज़ें आनी शुरू हो गयी कि "इंटरनेट नहीं चल रहा है " और सब एक-दूसरे से यही बात कर रहे थे कि "जब काम हो तभी बंद हो जाता है" या "यार आज सोचा था कि  से ही ये काम कर लूंगा" ।
जब सब बातचीत में व्यस्त थे और अलग-अलग मुद्दों पर बड़ी ही रोचक बातें कर रहे थे तब मैं अपने ;मोबाइल पर लगातार इंटरनेट चलने कि कोशिश कर रहा था । इन्ही कोशिशों के बीच पता ही नहीं चला ही कब लंच हो गया और मैं अपने मोबाइल को जेब के हवाले कर लंच करने चला गया । वापस आ कर देखा तो इंटरनेट चालू हो चुका था और मेरे पास बहुत काम इकट्ठा हो गया था । मैं बाकी लोगों के सामान अपना काम निपटाने में लग गया । काम निपटते-निपटाते शाम हो गयी और मैं ये सोचते हुए कि घर पहुँच कर इंटरनेट इस्तेमाल करूँगा, घर की तरफ निकल गया । घर पहुँचते ही अपने लैपटॉप पर इंटरनेट चालू करने कि कोशिश की तो वो भी नहीं चला ।
रात को बड़े ही खराब मूड के साथ ये सोच रहा था कि आज भी मैं अपने मन कि नहीं कर पाया और मेरा दिन खराब ही बीत गया । अचानक मेरी नज़र मेरे २ साल के बेटे पर गयी जो थक कर सो चुका था तो मैंने सोचा कि शाम को  मेरे बेटे ने मेरे परिवार के साथ कितनी मस्ती की थी । इसी क्रम में मैंने सोचा कि जब ऑफिस में इंटरनेट नहीं चल रहा था तब भी तो सब बड़ी अच्छी-अच्छी बातें कर रहे थे और मैं अपना समय मोबाइल में खराब कर रहा था ।
अब मैं यही सोच रहा था कि क्या मेरा दिन ख़राब गया था या मैंने ही ख़राब किया था ??????

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

भारत रत्न : एक सम्मान या राजनीति

भारत रत्न जो कि हमारे देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, आज सचिन तेंदुलकर और सी एन आर राव को मिल रहा है । राव जिन्हे हम थोड़ा कम जानते है उन्हें ये सम्मान रसायन शास्त्र में अपने अमूल्य योगदान के लिए मिल रहा है और सचिन को क्रिकेट में अपने अद्वितीय प्रदर्शन के लिए ।
सी एन आर राव भारत रत्न पाने वाले तीसरे वैज्ञानिक है । उनसे पहले ये सम्मान सी वी रमन और ए पी जे अब्दुल कलाम को मिल चुका है । सी वी रमन वो व्यक्ति है जिन्होंने इस दुनिया को "रामन प्रभाव" दिया था जो कि आज भी भौतिकी में शोध करने वाले शोधार्थियों के लिए एक प्रेरणा का काम कर रहा है और ए पी जे अब्दुल कलाम को ये सम्मान उनके अंतरिक्ष विज्ञानं में दिए योगदान के कारण मिला था । 
पता नहीं क्यों पर मेरी नज़र में  ए पी जे अब्दुल कलाम और सी एन आर राव को जो सम्मान मिला है वो कहीं न कहीं राजनीति से प्रेरित सा लगता है, इसलिए नहीं कि वो इसके लायक नहीं है अपितु इसलिए क्योंकि दोनों को ये सम्मान तब मिला है जब वो भारत सरकार के उच्च पदों पर विराजमान थे । डॉक्टर कलाम और डॉक्टर राव दोनों अपने-अपने क्षेत्र में बहुत काबिल व्यक्ति है और इनकी प्रतिभा को शक कि नज़र के देखना गलत ही होगा लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इन्हे इसलिए मिल गया क्योंकि सत्तारूढ़ दल कि इन पर विशेष मेहरबानी थी अन्यथा इनकी प्रतिभा भी कहीं धूल खा रही होती । डॉक्टर कलाम जब राष्ट्रपति बने तब मुझे तो यह लगा था कि उस सत्तारूढ़ दल ने जो उन पर कृपा की थी उसके बदले में वो उनसे राष्ट्रपति के रूप में उस दल विशेष का पक्ष चाहता था ताकि उनका भला हो सके , लेकिन मैं बहुत खुश हुआ ये देख कर कि डॉक्टर कलाम ने ये साबित कर दिया कि अगर मौका मिले तो हमारे देश को एक उम्दा राष्ट्रपति भी मिल सकता है । डॉक्टर कलाम ने हमें ये अहसास कराया कि राष्ट्रपति भी कुछ कर सकता है । 
डॉक्टर राव को ये सम्मान शायद मौजूदा सत्तारूढ़ दल से नज़दीकी के कारण मिला है । मैंने सुना है और विकिपीडिया पर पढ़ा भी है कि वो एक बहुत अच्छे वैज्ञानिक है । अब मेरा मन कह रहा है जैसे डॉक्टर कलाम ने खुद को साबित किया वैसे ही डॉक्टर राव भी खुद को साबित कर पाये क्योंकि आज के युग में खुद को साबित करना एक बड़ा काम है और ये काम बिलकुल भी आसान नहीं है क्योंकि मेरे जैसे बहुत से लोग है जो कहीं भी प्रश्न-चिन्ह लगा देते है क्योंकि हम दूध के जले वो लोग है जो कि छाछ भी फूँक कर पीना पसंद करते है । 
जब इस सम्मान के लिए सचिन के नाम कि घोषणा हुई तब भी यही बात हुई थी क्योंकि सचिन सत्तारूढ़ दल कि तरफ से राज्यसभा सदस्य है और उन्हें यह सम्मान सिर्फ इसलिए ही दिया गया है । सचिन खेल कि दुनिया का वो नाम है जिससे इस विश्व का लगभग हर खेलप्रेमी जानता होगा क्योंकि जो क्रिकेट को नहीं जानते है वो लोग भी सचिन को जानते है । लोगों ने कहा कि सचिन क्यों ध्यानचंद या आनंद क्यों नहीं?
मैं यह मानता हूँ कि ध्यानचंद और आनंद दोनों ही महान खिलाडी है लेकिन शायद उनमे वो बात नहीं है कि वो अपने दम पर इस सम्मान को खेल जगत के लिए खोल पाते । ये काम सिर्फ सचिन के बल पर ही सम्भव था और हुआ भी यही । अब अगले साल इन दोनों खिलाडियों को भी ये सम्मान अविलम्ब मिलना चाहिए और इसमें कोई राजनीति नहीं होना चाहिए ।
वैसे यहाँ मैं एक बात का जिक्र भी जरुर करना चाहूंगा कि मुझे बहुत बहुत और बहुत ज्यादा बुरा लगा था जब भारत रत्न से सम्मानित मदर टेरेसा कि मृत्यु हुई थी और सत्तारूढ़ दल ने सिर्फ इसलिए उनकी अंत्येष्टि राष्ट्रीय सम्मान से नहीं कि थी क्योंकि वो भारत में नहीं जन्मी थी । मेरे हिसाब से ये राजनीति का सबसे घिनौना उदहारण है और क्यों, ये बताने कि आवश्यकता मैं नहीं समझता की जरुरी है ।
अंतत: मैं डॉक्टर राव और सचिन को भारत रत्न को इस सम्मान को पाने के लिए बधाई देना चाहूंगा क्योंकि राजनीति को नज़रअंदाज़ किया जाये तो हम ये जान पाएंगे कि हाँ ये दोनों इस सम्मान के हक़दार है ।

बुधवार, 22 जनवरी 2014

दिल्ली दरबार

हाँ तो ऐसा है न कि केजरीवाल जी तबादले नाम के झुनझुने से मान  गए है । परदे के पीछे की कहानी न्यूज़ चैनल वाले कुछ - कुछ बता तो रहे थे पर हम फिर भी कहना चाहेंगे कि परदे के पीछे की कहानी हमें तो पता नहीं है । वैसे जो भी हुआ है अच्छा ही हुआ है क्योंकि अभी इन नौटंकियों का समय नहीं है ।
अभी तो हमें गणतंत्र दिवस कि तैयारियों में  ध्यान लगाना चाहिए क्योंकि केजरीवाल जी कि कृपा से दो दिन वैसे भी बड़ी मुश्किल से बीते है । मुझे नहीं पता कि केजरीवाल जी के मन में क्या है लेकिन मेरे मन में तो यही है कि ये समय सही नहीं था इस तरह बेवजह आम आदमी को परेशान करने के लिये । राजनीति चाहे अच्छी मंशा से हो या बुरी मंशा से मुझे लगता है राजनीति में अहं कि जगह नहीं होती है । वैसे ये भी सोचने कि बात है आज के परिप्रेक्ष्य में कि क्या राजनीति अच्छी मंशा से भी हो सकती है?
केजरीवाल जी ने कहा है कि जो किया सही किया । अब सही या गलत का सबका अपना-अपना अर्थ होता है और मेरे पास भी ये अधिकार तो है कि मैं घटनाओं को अपने तराजू में तौल सकता हूँ । मेरा मानना है कि जो हुआ गलत ही हुआ है और इसके पीछे कई कारण है । इन कारणों में से कुछ कारण जो मुझे अभी याद है, आप लोगों के साथ साझा करने कि कोशिश करता हूँ । 
पहला कारण जो मुझे लगता है वो ये है कि समय गलत था । इस समय जब दिल्ली हाई अलर्ट पर रहती है उस समय दिल्ली के प्रथम नागरिक को इस तरह कि हरकत शोभा नहीं देती है । आपकी इस हरकत से आम आदमी की सुरक्षा में कितनी बड़ी सेंधमारी हो सकती है इसका अगर आपको अंदाज़ा भी नहीं है तो आपको इस पद पर रहने का अधिकार मेरे हिसाब से तो नहीं है । 
दूसरा कारण ये है कि आप राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हो और अगर आप किसी समस्या के लिए देश के गृहमंत्री से मिलना अपनी बेइज्जती समझते हो तो आपको आत्ममंथन कि आवश्यकता है न कि अनशन कि नौटंकी करने कि । 
तीसरा कारण ये है कि आप एक तरीका जो कि आपके संविधान ने तय किया है उसको अपनाते और अगर फिर कोई आपकी बात नहीं सुनता तो आप अनशन करते और तब देखते कि ये आम आदमी आपको अपना पूर्ण समर्थन देता । 
आप अपने अहं कि वजह से गृहमंत्री से नहीं मिले और आपने सबको परेशान किया । आपका कहना है कि आप दिल्ली के मुख्यमंत्री हो और आपको दिल्ली पुलिस नहीं बता सकती है कि आपको क्या करना चाहिए तो केजरीवाल जी आपको बता दे कि दिल्ली पुलिस राष्ट्रीय राजधानी की पुलिस है और दिल्ली को राज्य के समकक्ष दर्जा सिर्फ इसलिए दिया गया है क्योंकि उसको किसी प्रदेश में शामिल नहीं किया जा सकता है और दिल्ली कि मुलभुत समस्याओं के निराकरण के लिए एक संवेधानिक संस्था की आवश्यकता है । 
दिल्ली पुलिस को अगर आपके या दिल्ली के मुख्यमंत्री के हवाले कर दिया तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र कि सुरक्षा राजनीति में फंस कर खतरे में पड़ सकती है । कैसे ये बताने कि आवश्यकता अब इस अनशन काण्ड के बाद तो नहीं होना चाहिए । अब जो आपका रूप आम आदमी देख रहा है वो तो यही सोच रहा है कि अब केजरीवाल हम से मैं बन गए है । 
मैं (ये मेरा वाला है आपका नहीं ) ये बात तो कह सकता हूँ कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो मान लीजिए कि ६ महीने बाद आपकी सरकार गिर जाती है तो दुबारा नहीं आ पायेगी । इस घटना को एक सबक के रूप में लीजिये और कोशिश कीजिये कि आपके कारण आम आदमी परेशान न हो । 
और जाते जाते कुछ अलग बात करते है और वो अलग बात ये है कि भारत फिर हार गया और नंबर १ कि कुर्सी के बेदखल हो गया, है न अलग बात :)

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

केजरीवाल का बालहठ

"If you don't like the rule, follow the rule, reach the top and change the rule..."

ये पंक्तियाँ मैंने कहीं पढी थी और मुझे सही भी लगी थी लेकिन आजकल केजरीवाल जी के तथाकथित आंदोलनों को देख कर लग रहा है कि वो सिर्फ सत्ता सुख चाहते है उन्हें आम आदमी या आम आदमी को परेशान करने वाले नियमों से कोई लेना-देना नहीं है । ताज़ा आंदोलन तो इसी बात को प्रदर्शित कर रहा है । उन्हें दिल्ली की जनता ने एक मौका ये सोच कर दिया है कि ये बंदा परिवर्तन लायेगा लेकिन वो तो अब बस अपनी ताक़त को बढाने में लग गए है ।
मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि क्यों केजरीवाल दिल्ली कि पुलिस के मुद्दे को सही तरीके से हल नहीं करना चाहते है । हर बात को करने का एक तरीका होता है और अगर हमें वो तरीका पसंद नहीं है और हमारे पास उससे बेहतर तरीका है तो हमें अपने आप को इस काबिल बनाना चाहिए कि हम बदलाव कर सके न कि इस तरह गैर ज़िम्मेदाराना तरीके अपनाने चाहिए । आप एक प्रदेश के मुख्यमंत्री हो और उस पद कि गरिमा रखना आपका दायित्व है ।  आप तो बस जा कर धरने पर बैठ गए, आपने ये क्यों नहीं सोचा कि गणतंत्र दिवस पास में है और आप जिस क्षेत्र के मुख्यमंत्री हो वो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी है । अगर कल को कुछ भी उंच-नीच हो जाती है तो उसकी जिम्मेदारी तो आप झट से केंद्र सरकार पर डाल दोगे कि इनकी गलती क्योंकि पुलिस तो इनके मातहत काम करती है , आप ये नहीं सोचना चाहते हो कि यदि आप अभी ये मुद्दे इस तरह से उठाओगे तो पुलिस को कितनी परेशानी होगी ।
इस समय पूरा ध्यान गणतंत्र दिवस पर होना चाहिए कि उस समय कोई अनहोनी न हो और आपको इसमें सहयोग करना चाहिए न कि बच्चो सामान ज़िद पर अड़ जाना । इस समय आम जनता कि सुरक्षा कि चिंता होनी चाहिए न कि अपने मंत्री को बचाने की कवायद कि जानी चाहिए । आपके इस आंदोलन से आम जनता को तो स्पष्ट नज़र आ रहा है कि ये आपके और आपके मंत्री कि अहं कि लड़ाई है और कुछ नहीं ।
आपका कहना है कि मेट्रो स्टेशन आपने बंद नहीं करवाये केंद्र ने करवाये है और पुलिस ने करवाये है । ठीक है माना उन्होंने करवाये है लेकिन कारण तो आप ही हो न आप मानो या न मानो । अगर आपके अनशन का फायदा उठा कर अराजक तत्त्व मेट्रो में फ्री घूस जाते है और उत्पात मचाते है तो उसका जिम्मेदार तो आप केंद्र और पुलिस को बोल दोगे बिना ये सोचे के उनको गणतंत्र दिवस के पहले बहुत सी तैयारियां करनी होती है और हर जगह सघन तलाशी अभियान चलाने होते है । ऐसे में वो आपके अनशन स्थल के आस-पास ध्यान दे या पूरी दिल्ली कि सुरक्षा पर ध्यान दे ।
केजरीवाल जी आपको जनता ने मौका दिया है उसको इस तरह गवाओं नहीं । ये जो आप कर रहे हो ये बालहठ से ज्यादा कुछ नहीं है । अगर वाकई कुछ करना चाहते हो तो एक प्रक्रिया का पालन करो । अगर उस प्रक्रिया से हल नहीं निकलता है तो जहाँ कमी है वहाँ पहुँचने कि कोशिश करो और प्रक्रिया बदलो यूँ आम जनता को परेशान नहीं करो ।
और हाँ जब दिल्ली में निर्भया बलात्कार हुआ था तब आपने शीला दीक्षित को इसका ज़िम्मेदार माना था और उनके इस बयान पर कि दिल्ली पुलिस उनके अधीन नहीं है कहा था कि वो बहाना बना रही है और मुद्दों से भटका रही है और अब आप भी इस अनशन कि नौटंकी से वही तो कर रहे हो । 
शनिवार, 18 जनवरी 2014

मदद में स्वार्थ नहीं ढूंढे ...

जनवरी कि एक सर्द शाम को मेरे शहर भोपाल में बादल खूब जम कर बरस चुके थे । मैंने जब देखा कि बारिश और हो सकती है तो मैंने अपना सारा सामान अपने वॉटर-प्रूफ़ बैग में डाला और मैं निकल पड़ा अपने ऑफिस से घर जाने के लिये । मेरे ऑफिस और घर के रास्ते में एक रेलवे क्रासिंग पड़ती है और मुख्य मार्ग से उस क्रासिंग तक जाने के दो रास्ते हैं । एक रास्ता जिसको हम पक्का रास्ता बोल सकते है क्योंकि उस पर बहुत ज्यादा टूटी-फूटी ही सही मगर एक सड़क बनी हुई है और एक मिट्टी का कच्चा रास्ता है जो किसी ने बनाया नहीं है अपने आप बन गया है और जब बारिश न हो तब वो रास्ता पक्के रास्ते से ज्यादा समतल रहता है ।
तो मैं जब उस रेलवे क्रासिंग के करीब पहुँच रहा था तब बारिश के बावजूद मैंने पता नहीं क्यों उस कच्चे रास्ते हो चुन लिया और कुछ दूरी पार करते ही मैं अपनी बाइक समेत कीचड़ में बुरी तरह से फंस गया । मैंने देखा कुछ दूरी पर एक और व्यक्ति फंसा हुआ था और अपनी बाइक कीचड़ से निकालने कि कोशिश कर रहा था । मैं भी अपनी बाइक  निकालने कि कोशिशों में जुट गया । 
जब मैं बाइक  निकालने की कोशिश कर रहा था तभी मुझे उस ओर एक और बाइक आती नज़र आयी । मैंने उसे तुरंत रुकने का इशारा किया और बोला कि," यहाँ मत आओ, बहुत ज्यादा कीचड़ है और तुम बाइक समेत फंस जाओगे " तो उस पर सवार लड़के ने अपनी बाइक तुरंत रोक दी और कुछ दूर पैदल चल कर मेरी तरफ आने लगा । मैंने उसके पहनावे को देख कर कहा कि, "यहाँ मत आओ तुम्हारे जूते और कपडे कीचड़ में ख़राब हो जायेंगे, जैसे मेरे हो गए हैं "। मेरा ये बोलने के बाद जो उस लड़के ने बोला वो मेरे मानस पटल पर बहुत गहरी छाप छोड़ गया, वो बोला कि, " भैया अगर आप मुझे नहीं रोकते तो मेरे जूते और कपडे तो ख़राब होने ही थे, आपके बोलने के कारण मेरी बाइक इस कीचड़ में फंसने से बच गयी और आपकी बाइक भारी है आप अकेले नहीं निकाल पाओगे" ।
फिर उसने मेरी बाइक निकलने में मेरी मदद की, बिना किसी झिझक और परवाह किये । मेरी बाइक निकलवाने के बाद उस लड़के ने उस दूसरे व्यक्ति कि भी मदद कि और उसकी बाइक भी बाहर निकलवा दी । फिर वो लड़का बोला कि, " भैया अब आप पहियों को थोड़ा साफ़ करके घर जा सकते हो", और ऐसा कह कर वो अपनी बाइक ले कर चला गया । वैसे तो मैंने उस लड़के को धन्यवाद बोला था उसकी इस मदद के लिए लेकिन मुझे अब भी लग रहा है कि शायद वो धन्यवाद कम था । इस उहापोह कि स्थिति में मैं उस लड़के से उसका नाम भी पूछना भूल गया और ये बात मुझे शायद पूरी ज़िन्दगी परेशान करेगी । 
एक न भूलने वाला सबक वो मुझे दे गया था कि आप जिस तरह और जितनी मदद कर सकते हो करो और मदद के समय ये मत देखो कि आप जिसकी मदद कर रहे हो वो आपका परिचित है या नहीं ...
धन्यवाद दोस्त... ईश्वर करे कि मैं तुमसे दुबारा मिलने का मौका मिले और धन्यवाद मुझे ये सीखने के लिखे कि मदद निस्वार्थ भाव से भी कि जा सकती है । 
यह घटना मेरे साथ जनवरी १८, २०१४ को बावर्ची ढाबे के पास होशंगाबाद रोड पर शाम ६:३० के आस-पास घटित हुई थी । 

बुधवार, 15 जनवरी 2014

भारतीय राजनीति : आजकल

भारतीय राजनीति आजकल एक नए दौर से गुजर रही है । इस नए दौर में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं ।  अरविन्द केजरीवाल ने जब से आम आदमी पार्टी या यूँ कहे कि आप का गठन किया है तब से इस दौर कि  शुरुआत मानी जा सकती है ।  जब आप का गठन हुआ था तब सभी पार्टियों ने इस नयी पहल को बहुत हलके में  था लेकिन दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों के बाद स्थितियाँ  बहुत बदल गयी है ।
दिल्ली विधानसभा चुनावों ने भारत कि सभी राजनैतिक पार्टियों को एक अति-महत्वपूर्ण सिख दी है कि सुधर जाओ नहीं तो खत्म कर दिए जाओगे । वैसे दिल्ली केजरीवाल का कर्मक्षेत्र रहा है और मेरे हिसाब से सिर्फ वहाँ मिली सफलता से आप को अतिउत्साहित नहीं होना चाहिए जो कि आजकल नज़र आ रहा है ।
कुमार विश्वास का अमेठी से चुनाव लड़ना मेरे हिसाब से उस अति उत्साह का ही नतीज़ा है । आप को लगता है कि जैसे वो दिल्ली में शीला दीक्षित को हरा सकते है वैसे ही अमेठी में राहुल गांधी को हरा देंगे तो मेरा यह मानना है कि शीला दीक्षित को खुद अरविन्द केजरीवाल ने हराया था और कुमार विश्वास चाह कर भी केजरीवाल नहीं बन सकते है । अमेठी में राहुल गांधी ने एक सांसद के तौर पर बहुत काम किया है और उनकी पार्टी कि धूमिल होती छवि से उन्हें शायद ही कोई व्यक्तिगत नुक़सान हो ।
आप नेता योगेन्द्र यादव जी का कहना कहना है कि मुकाबला आप और बीजेपी में है और कांग्रेस कहीं भी तस्वीर में नहीं हैं । योगेन्द्र जी कांग्रेस का तो इस बार बुरा हाल होना तय था चाहे आप होती या न होती, आप के आ जाने से नुक़सान बीजेपी को ही होगा । मुझे और बीजेपी के ताज़ा बयानों को देख कर ऐसा लगता है कि आप और बीजेपी कि लड़ाई में कांग्रेस को फायदा हो सकता है क्योंकि आप के आने से बीजेपी का वोट बैंक आप की तरफ जा सकता है और अगर ऐसा हुआ तो कम वोट के सहारे ही सही कांग्रेस नुकसान को कम सकती है । भैया ऐसा है कि दो बिल्लियों कि लड़ाई में अक्सर फायदा बन्दर को हो जाता है ।
नमो आप से डर गए है क्योंकि यदि आप ने उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में अपने उम्मीदवार उतार दिए तो नुक़सान सबसे ज्यादा बीजेपी को ही होगा । उत्तर प्रदेश में आप समेत ५ पार्टियां प्रमुखता से चुनाव लड़ेंगी और सपा-बसपा के वजूद को नकारना गलत होगा । महाराष्ट्र में तो शिव सेना, राज ठाकरे, एन सी पी की पकड़ बहुत ज्यादा है तभी तो बीजेपी को शिव सेना और कांग्रेस को एन सी पी का सहारा है । हाँ मध्य प्रदेश और गुजरात में कोई बड़ा नुक़सान बीजेपी को होता नज़र नहीं आ रहा है लेकिन नमो को प्रधानमंत्री बनना है तो बीजेपी को एकला चलो ही अपनाना पड़ेगा ।
वैसे आप और कांग्रेस दोनों आजकल एक ही समस्या से दो चार हो रहे है और वो है उनके भस्मासुर । दोनों ही पार्टियों के पास भस्मासुरों कि कमी नहीं और अगर समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो दोनों को नुकसान होना तय है । मुझे नहीं लगता कि मुझे यहाँ आप या कांग्रेस को भस्मासुरों  बताने ज़रूरी हैं ।
अंततः मुझे जो समझ आया है अभी तहतक वो यह है कि बीजेपी पूरी ताकत से नमो को प्रधानमंत्री बनाना छह रही है, कांग्रेसी राहुल पार्को जितवाने कि कोशिश करने की जगह उनसे ये उम्मीद पाले बैठे है कि ये हमें जितवाएगा और आप तो बस आप है उनको क्या कहें...

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

सचिन...

आख़िरकार सचिन रमेश तेंडुलकर ने एकदिवसीय अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट को कल अलविदा कह दिया । ये तो एक ना एक दिन होना ही था लेकिन मन अभी भी मानने को तैयार नहीं है कि सचिन एकदिवसीय क्रिकेट नहीं खेलेगा । मुझे तो ये सुन कर ऐसा लगा जैसे 23 दिसम्बर 2012 वो दिन है जिस दिन एकदिवसीय क्रिकेट ने अपनी पहचान खो दी है । मेरे लिए तो बिना सचिन के एक दिवसीय देखना मतलब बिना नमक के खाना खाने जैसा होगा ।
23 साल 463 एकदिवसीय 18426 रन्स और 49 शतक, ये वो आंकडें है जिन्हें छूना आसान नहीं होगा । 23 साल तक एक जज़्बे को पूरी निष्ठां के साथ जीना कोई आसान काम नहीं है । वैसे तो सचिन को कुछ शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है किन्तु टाइम मैगज़ीन का यह कहना कि "We can get great players, we can get champions but we cant get another SACHIN TENDULKAR " बहुत सही टिप्पणी है । सचिन सिर्फ सचिन ही हो सकते है कोई और नहीं ।
सचिन ने अपने एकदिवसीय करियर में जो मुकाम बनाये है कई बार तो वो खुद भी उन तक नहीं जा पाते थे तो हम किसी और से ये उम्मीद भी कैसे रह सकते है, सचिन को तो सिर्फ सचिन ही टक्कर दे सकते है और कोई नहीं । 4 साल की उम्र में बल्ला पकड़ने वाले शख्स ने अभी तो क्रिकेट के एक प्रारूप को अलविदा नहीं कहा है लेकिन आप सोचो जब वो ये कह देगा कि बस अब और क्रिकेट नहीं, तब तो क्रिकेट के कलयुग की शुरुआत हो जायेगी क्योंकि क्रिकेट के भगवान् उससे दूर हो जायेंगे ।
23 साल तो सिर्फ अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट के हुए है अगर हम देखे तो सचिन तो इस खेल को पिछले 35 सालों से खेल रहे है और आज जब एकदिवसीय प्रारूप को ना बोल रहे है तब भी सिर्फ इसलिए ताकि उनका स्थान कोई और ले सके और इस बात को कोई नहीं नकार सकता है की हम टीम में तो उनका स्थान भर देंगे लेकिन क्या वाकई कोई उनका "रिप्लेसमेंट" हो सकता है?
अंततः मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि मैं उन भाग्यशाली लोगों में शामिल हूँ जिन्होंने सचिन को एकदिवसीय खेलते देखा है ।
Sachin we really miss you a lot...
सोमवार, 17 दिसंबर 2012

पता नहीं क्या चाहता हूँ ...

आजकल मेरी ज़िन्दगी बड़ी उआह-पोह भरी चल रही है । मुझे नहीं पता क्यों बस चल रही है और मैं भी उसके साथ चलने की कोशिश कर रहा हूँ । कभी-कभी हमें नहीं पता होता है की हम जो कर रहे है वो क्यों कर रहे है और जो कर रहे है, क्या वाकई वो करना चाहते है???
व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है की हम मनुष्य प्रजाति का अनुसरण करते है और हमें निरंतर आगे बढते रहना चाहिए लेकिन मेरे आस-पास बहुत से ऐसे लोग है जो ये सोचते है कि हमें संतुष्ट हो जाना चाहिए । मेरे लिए संतुष्टि का अर्थ अंत है क्योंकि अगर हम आगे नहीं बड़े तो हमारा मनुष्य होना बेकार है ।
मैंने कहीं पढ़ा था कि "खुद पर भरोसा करना सीखना है तो चिड़ियाओं से सीखो क्योंकि जब वो शाम को घर लौटती है तो उनके पास कल के लिए दाना नहीं होता है", मैंने सोचा की मैंने यदि ऐसा किया तो मुझे दिहाड़ी मजदूर ही माना जायेगा और वो तो 26 रूपये में ही जीवन जीता है (भारत सरकार के आंकड़ो के अनुसार )।
 ज्ञान की चार बातों के बाद अब हम मुद्दे की बात करते है की मैं क्या कर रहा हूँ या मैं क्या करना चाहता हूँ । मैं क्या करना चाहता हूँ की बात करे तो मुझे यही लगता है की मैं जो कर रहा हूँ कम से कम मैं वो तो नहीं करना चाहता हूँ क्योंकि मैं अंतर्मन से खुश नहीं हूँ मुझे खुश होना पड़ रहा है और मैं खुश होना चाहता हूँ न की पड़ना चाहता हूँ और जब आप खुश होते हो तब ही आप संतुष्ट हो सकते हो।
आजकल खुश होना सीखना पड़ता है लेकिन मैं नहीं मानता की खुश होना सीखने वाली बात होती है, ये तो एक ऐसी प्रक्रिया है जो स्वत होना चाहिए और ये बात आप किसी भी छोटे बच्चे से जान सकते हो । किसी भी छोटे बच्चे को खुश होने के लिए छोटी सी वजह भी बहुत होती  है क्योंकि वो बस खुश है और क्यों खुश है वो नहीं जानता है वो तो बस ये देखता है की उसके आस-पास सब खुश है और मुस्कुरा रहे है तो उसको भी यही करना है ।
आप लोग सोच रहे होगे की ये बंदा आखिर बोलना क्या चाह रहा है??? कभी ये बोलता है कभी वो बोलता है, बस मुद्दे की बात ही नहीं कर रहा है, तो मैं आपको बताना चाहता हूँ की मैं इसी उआह-पोह से गुजर रहा हूँ कि आखिर मैं चाहता क्या हूँ???मेरे मन में अनेकों विचार एक साथ चल रहे है और "आर्ट ऑफ़ लिविंग" वालों ने कहा है की विचारों को रोको मत आने दो और मैं उनसे पूछना भूल गया की वो "रोको, मत आने दो" बोल रहे है या "रोको मत, आने दो" बोलना चाह रहे है????
आपको क्या लगता है अगर समय मिल सके तो बताइयेगा ...

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

अग्नि पथ

वृक्ष हों भले खड़े, हो घने, हो बड़े,
एक पत्र-छाह भी मांग मत, मांग मत, मांग मत
अग्नि पथ अग्नि पथ अग्नि पथ
तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
ये महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत् रक्त से,
लथ पथ, लथ पथ, लथ पथ ,
अग्नि पथ अग्नि पथ अग्नि पथ
--हरिवंशराय बच्चन
ये कविता जब मुकुल एस आनंद ने सुनी थी तब उन्होंने अपनी निर्माणाधीन मूवी का नाम अग्निपथ रखने का निर्णय लिया था और श्री हरिवंश राय बच्चन जी से इस कविता को अपनी मूवी में इस्तेमाल करने की अनुमति भी मांगी थी ।
१९९० में प्रदर्शित "अग्निपथ" अमिताभ बच्चन की यादगार मूवीस में से एक है और इस बात में कोई दोराय नहीं हो सकती है की उन जैसा कोई नहीं है । मुझे कल नयी अग्निपथ देखने का मौका मिल गया अपने एक मित्र की वजह से तो मैंने सोचा चलो दान की बछिया के दांत नहीं गिनते है और बिना कोई पूर्वनियोजित धारणा के मैं मूवी देखने पहुँच गया ।
मैंने अमिताभ वाली अग्निपथ सिनेमा हॉल में ही देखी थी और कई बार टीवी पर भी देखने का मौका मिला था । ये वो अग्निपथ थी जिस पर चल कर अमिताभ को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था । नयी अग्निपथ के बारे में मुझे ठोड़ी बहुत जानकारी थी और वो ये थी की नया विजय दीनानाथ चौहान हृतिक है और नया कांचा संजय दत्त जो की एक बार फिर मांडवा को हासिल करने के आमने सामने है ।
फिल्म की शुरुआत में मुझे ये समझ आ गया की नयी और पुराणी अग्निपथ की एक समानता है की दोनों फिल्मों के नायकों का लक्ष्य एक ही है - पिता की मौत का बदला लेना और अपने गाँव को वापस हासिल करना । नयी अग्निपथ की शुरुआत और बेहतर हो सकती थी अगर निर्देशक मास्टर दीनानाथ चौहान को हलके में नहीं लेते । मास्टर दीनानाथ चौहान के चरित्र को और बेहतर अभिनेता और बेहतर तरीके से निभा सकता था और कुछ संवाद लेखन भी बेहतर किया जान चाहिए था मसलन "पहलवान" के स्थान पर "ताकतवर" शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि नायक को खलनायक से कुश्ती नहीं लड़ना थी वरन बदला लेना था ।
नयी अग्निपथ में मैंने एक चरित्र को मिस किया है और वो है "नाथू" जो की उस गाँव में मास्टर दीनानाथ के बाद विजय किया एक सच्चा समर्थक था । नयी अग्निपथ में विजय को गाँव वाले उसकी माँ के कारण पहचान पाए थे । नए गायतोंडे के रूप में ओम पूरी ने बहुत अच्छा काम किया है और ज़रीना वहाब ने भी माँ के छोटे से चरित्र को अच्छे से निभाया है और कहीं भी मिथुन दा के कृष्णन अईयर की कमी महसूस नहीं हुयी ।
हमें हृतिक से अमिताभ वाला टोन आपेक्षित नहीं करना चाहिए, दोनों की अपनी पहचान है और इसी कारण हमें ताकत पाने के तरीके की आलोचना नहीं करना चाहिए । हमें ये नहीं सोचना चाहिए की हृतिक भी अमिताभ की तरह हई करेगा । आज का विजय ताक़त पाने के लिए सिर्फ जोश का सहारा नहीं लेता है, वो आज की परिस्तिथि के अनुसार चल कर ताक़त हासिल करता है क्योंकि राउफ लाला (ऋषि कपूर) तरलिन, उस्मान भाई या अन्ना शेट्टी नहीं है । ऋषि कपूर ने राउफ लाला के चरित्र को एक अलग पहचान दी है जो काबिले तारीफ है ।
नयी अग्निपथ में शिक्षा (विजय की बहन) एक स्कूल जाने वाली लड़की है इसलिए उसकी लाइफ में कृष्णन अईयर की आवश्यकता नहीं है जो की मेरी नज़र में सही निर्णय है । नायिका के रूप में प्रियंका ने अच्छा काम किया है लेकिन इस कहानी में नायिका केवल नाचने गाने के लिए ही हो सकती है क्योंकि नायक अपना लक्ष्य उससे मिलने के पहले ही निर्धारित कर चूका है ।
अंत में केवल एक ही बात कही जा सकती है "This movie is not remake it is REPRESENTATION" (जयदीप सिंह गिरनार* जी से साभार ) इसलिए कृपया इसे हृतिक की अग्निपथ समझे अमिताभ की नहीं ।
* जयदीप सिंह गिरनार जी मेरे फेस बुक मित्र है और ९४.३ My FM में मुझे इनके साथ काम करने का मौका भी मिला है ।
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

कृप्या अपने किये की जिम्मेदारी ले...

पता नहीं क्यों लेकिन आज तक मुझे एक बात समझ नहीं आई की हम अपने आप को सही साबित करने के लिए दूसरों को गलत क्यों साबित करना चाहते है | आज कल एक राजनेता ( वैसे तो लोग समय बचाने या आलस के कारण इस प्रजाति को नेता बोलते है किन्तु मैं राजनेता बोलना पसंद करता हूँ ) दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप तो ऐसे लगाता है जैसे कोई प्रतियोगिता चल रही है और सबसे ज्यादा आरोप लगाने वाले को कोई पुरस्कार मिलने वाला है | मुझे अच्छे से जानने वाले ये बात जरुर जानते है की मैं कभी अपनी चीज़ को अच्छा कहने के लिए दूसरों की चीज़ को बुरा नहीं कहता हूँ क्योंकि मुझे लगता है हर व्यक्ति सौ फीसदी अच्छा या बुरा नहीं हो सकता है |
मेरा मानना यह है की अगर आपके पास कुछ है जो की आपकी नज़र में अच्छा है वो बाकि लोगों की नज़र में भी अच्छा हो ये जरुरी नहीं है और आपके पास जो है उसको अच्छा साबित करने के लिए दूसरों पर किसी तरह का आक्षेप लगाना गलत है | अगर हम खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए दूसरों को नीचा दिखाते है या साबित करने की कोशिश करते है तो कही न कही हम अपनी कमजोरी को छिपाना चाह रहे होते है |
हमें हमेशा ध्यान रहना चाहिए की "अह्म ब्रह्मास्मि" का परिणाम कभी सुखद नहीं हो सकता है क्योंकि स्वयं ब्रह्मा भी खुद को सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते है | हम परमात्मा को एक शक्ति के रूप में पूजते है और कर्म और भाग्य में विश्वास भी करते है | कुछ लोग कर्म में विश्वास रखते है और कुछ भाग्य में , लेकिन अंततः हमें जुड़ना उस परमात्मा से ही है |
मैं व्यक्तिगत रूप से स्वयं को सिर्फ अपने ज़मीर के प्रति जवाबदेह मानता हूँ क्योंकि मुझे लगता है की मेरा ज़मीर मुझे मेरे भगवान् से जोड़ता है और अगर कोई शक्ति है जो आपके कर्मों का या आपके भाग्य का लेखा जोखा रख रही है तो वो आपके ज़मीर से आपका मूल्यांकन करवा रही है |
आजकल संचार साधनों के कारण हमें तुरंत पता चल जाता है की किसने किसके लिए क्या क्यों और कब कहा | मुझे लगता है की अगर हम किसी पर एक उंगली उठा रहे है तो बाकि तीन हमारी तरफ है इसलिए हमें किसी की बात से सहमत या असहमत होने का अधिकार तो है लेकिन उसको सही या गलत कहने का अधिकार नहीं है | हमें अपनी बात को मजबूती से रखना चाहिए बजाए दूसरों की बात को गलत साबित करने की कोशिश करने के...
शुक्रवार, 17 जून 2011

मेरा प्रेक्टिकल न होना...

जब भी मैं अपनी ३१ साला ज़िन्दगी का आंकलन करने की एक असफल सी कोशिश करता हूँ तब-तब मुझे एक बात बहुत परेशान करती है और वो है मेरा प्रक्टिकल न होना...
बचपन से मैं थोडा लीक से अलग चलने वाला बन्दा मानता रहा हूँ खुद को लेकिन जब-जब मैं खुद को अतीत के आईने में देखता हूँ तब-तब मेरा ये भ्रम टूट सा जाता है क्योंकि कहीं ना कहीं जब भी मैंने लीक से हट कर चलने की गुस्ताखी की है मेरे प्रयास को एक अति इमोशनल अंदाज़ में दबा दिया गया है और मैं खुद उस दबाव में आ गया हूँ क्योंकि मैं खुद को प्रेक्टिकल समझता तो हूँ लेकिन असलियत में तो मैं एक इमोशनल व्यक्तित्व का मालिक या यूँ कहे की गुलाम हूँ |
बचपन में जब भी मुझे कोई चाहत होती थी मैं अपने माता-पिता को बताने में हमेशा झिझकता था क्योंकि मेरे मन में हमेशा ये डर रहता था कि कहीं वो ना तो नहीं कर देंगे और अक्सर होता भी यही था | मुझे नहीं पता इस डर के पीछे कारण क्या था लेकिन ऐसा अक्सर होता था |
थोडा बड़ा हुआ तो मैंने आक्रामक रुख अपनाना चालू कर दिया और मन में एक बात को घर करने दिया कि जो आसानी से ना मिले उसे लड़ कर हासिल करो और कई बार मैं सफल भी हुआ लेकिन उस चाहत को पाने कि जो ख़ुशी मुझे महसूस होना चाहिए थी वो मुझे नहीं हो पायी क्योंकि मैं आक्रामक बन रहा था प्रक्टिकल नहीं...
अपने जीवन के कुछ बड़े फैसले मैं लेना चाहता था लेकिन मुझे नहीं लेने दिए गए, हर बार इस समाज कि दुहाई दे कर मेरे अरमानों को नज़र-अंदाज़ कर दिया गया | मैं फिर भी शायद किसी को दोष नहीं दे सकता हूँ क्योंकि गलती मेरी ही थी कि मैंने खुद के बारे में न सोच कर दूसरों के बारे में सोचा और जो खुद के बारे में नहीं सोच सकता है उसके बारे में तो आजकल भगवान्  भी नहीं सोचते है क्योंकि उन्होंने भी आजकल के हिसाब से अपने आप को अपग्रेड कर लिया है और वो भी प्रेक्टिकल हो गए है |
मैं आज जहां हु जिस स्थिति  में हूँ खुद को खुश नहीं रख पा रहा हूँ क्योंकि ये वो लाइफ नहीं है जो मैंने खुद के लिए सोची थी और अभी भी प्रेक्टिकल नहीं हो पा रहा हूँ कि इन परिस्थितियों में भी खुश रहना सीख सकूँ | आज कि दुनिया का एक बहुत महत्वपूर्ण सबक मैंने जो नहीं सिखा है कि या तो इमोशनल हो कर अपने अरमानों को एक संदूक में ताला मार कर गहरे समुन्दर में फेंक दो और वही करो जो दुसरे चाहते है या प्रेक्टिकल बन जाओ | आज कि दुनिया में मेरे जैसे त्रिशंकुओं के लिए कोई जगह नहीं है जिन्हें ये ग़लतफ़हमी है कि वो इमोशनल और प्रेक्टिकल के बीच एक पुल का काम कर सकते है और असल में हम जैसे लोग पुल नहीं त्रिशंकु होते है |
गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

कुछ अलग करना चाहता हूँ...

करीब-करीब साल भर बाद आज थोडा वक़्त मिला है कुछ लिखने लायक पर बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा है कि क्या लिखा जाए | साल भर में परिस्थितियां बहुत बदल सी गयी लगती है जैसे अब शादीशुदा हूँ और इस बात को हँसते हुए बताऊ या रोते हुए पता नहीं...
अब कुछ बड़ा करने का मन कर रहा है समथिंग रिअली बिग... आजकल ऑफिस में तो ऐसा लगता है जैसे टाइम पास करने आये हुए है और बदकिस्मती से वह भी नहीं कर पाते है और जैसे मन उकताहट कि परिकाष्ठा से गुजर रहा है | आज मैं हिंदुस्तान में बनी पहली एनिमेशन फिल्म देख रहा था तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था कि १९७० के दशक में भी भारतीय एनिमेशन बहुत अच्छा हुआ करता था, शायद आपको याद हो " एक चिड़ियाँ अनेक चिड़ियाँ...", हांजी ये हिंदुस्तान में बनी पहली एनिमेशन फिल्म थी | वैसे आप सोच रहे होंगे कि मैंने बात कि शुरुआत कहा से कि थी और मैं बात को कहाँ ले गया या ले जा रहा हूँ पर क्या करू कुछ लिखना चाहता हूँ और समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखना चाह रहा हूँ :(
कल सोच रहा था कि थोडा स्मिथ को भला-बुरा बोलू, वैसे भला तो क्या बोलता बुरा कि बोलता अगर बोलता तो क्योंकि मैं एक आलोचक हूँ और ऐसा मैं नहीं कहता मेरे आस पास वाले कहते हैं | आजकल लोग ये भूल गए है कि "निंदक नियरे रखिये..." वैसे मुझे कहीं बाहर भी नहीं जाना पड़ता है क्योंकि कुछ लोग मेरे घर में ही मिल जाते है इस तरह के जो निंदक पास नहीं रखना चाहते हैं | मुझसे लोग कहते है कि मैं किसी कि नहीं सुनता पर कोई ये जाने कि कोशिश नहीं करता कि क्यों नहीं सुनता हूँ |
आजकल सबको यही लगता है कि सिर्फ वह ही सही है तो ये मुझे भी लगे कि मैं ही सही हूँ तो इसमें गलत क्या हैं? सब केवल गल्तियाँ गिनाते है तो मैं भी गिनाता हू और इसमें गलत क्या है ????
आज भी मेरे ऑफिस में कुछ काम नहीं हुआ क्योंकि विदेश में सब क्रिसमस और न्यू इयर जो बना रहे है और हम यहाँ रोज़ ८ घंटे उनका इन्तजार कर रहे है कि उनका बन जाए तो हम काम चालू करे क्यों ऑफिस तो आना ही है चाहे काम हो या ना हो |
वैसे अगले कुछ दिनों में मैं कुछ लिखू ना लिखू इसलिए अभी लिख देता हूँ कि हर उस को नव वर्ष कि शुभकामनायें जो गलती से मेरे इस ब्लॉग को पढ़ रहा हैं |
चलिए हुआ तो घर जा कर कुछ लिखने कि कोशिश करूँगा...