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शनिवार, 17 मई 2014

अच्छे दिन आ सकते है???

इलेक्शन हो गए और अबकी बार मोदी सरकार भी बन गयी।  हमें मोदी जी को बधाई देनी चाहिए, इसलिए नहीं की वो देश के नए प्रधानमंत्री बनने वाले है बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने एक लॉन्ग टर्म विज़न के साथ एक असंभव सा दिखने वाला काम कर दिखाया है।  १९८४ के बाद इस देश की राजनीति ने बहुत अस्थिरता देखी है। इस देख ने लगातार चुनाव झेले भी है।  श्री अटल बिहारी वाजपाई जी ने एक प्रयास किया था सबको साथ रख कर सरकार चलने का जिसमे वो तो पूरी तरह सफल नहीं हो पाये थे लेकिन उनसे सीख कर कांग्रेस ने ये काम १० सालों तक किया।  मोदी जी ने कांग्रेस के इन १० सालों के शासन को बहुत करीब से देखा है और हमें उनकी सोच की दाद देनी चाहिए की उन्होंने कांग्रेस की गलतियों को बड़ी बारीकी से न सिर्फ समझा साथ ही उनका सही फायदा भी उठाया और इसी के चलते उनकी पहली कोशिश ये थी की बहुमत को भाजपा खुद हासिल करे। आज जब क्षेत्रीय दल अपनी बेजा डिमांड के परेशान करते है ऐसे समय मोदी जी की ये सोच एकदम सही है।
इस बार जो सरकार बनी है उसमे यूपी, राजस्थान, गुजरात, एमपी, छत्तीसगढ़, दिल्ली और उत्तराखंड की महती भूमिका रही है।  इन ७ राज्यों ने भाजपा को १७० के करीब सीट्स दी है। दिल्ली, उत्तराखंड, गुजरात और राजस्थान में तो कोई और दल अपना खाता भी नहीं खोल पाया है जो की एक अभूतपूर्व बात है।  अब मोदी जी को दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनाने की कोशिश करना चाहिए ताकि अगले इलेक्शन में वहाँ के क्षेत्रीय दलों का भी सफाया हो जाए और भारत में मजबूत सरकार बनाने का जो रास्ता मोदी ने री-ओपन किया है वो हमेशा खुला ही रहे।
भारत एक बहूत विशाल लोकतंत्र है और क्षेत्रीयता के आधार पर वोट मांगने वालों की यहाँ  भरमार है।  मुझे कभी-कभी बहुत दुःख होता है ये देख कर की कैसे मिली-जुली सरकार में ये दल अपना उल्लू सीधा करते है और वोटर उल्लू बना सब देखता रहता है और फिर अगले इलेक्शन में वही गलती दोहराता है। मोदी जी ने भाजपा को २७२ से ज्यादा सीट्स दिलवाकर ये एक बहुत अच्छा काम किया है।  मुझे उम्मीद है की ये भाजपा सरकार (एनडीए सरकार नहीं ) अच्छा काम करें।  मुझे डर लगता है इनके कुछ साथियों से क्योंकि उनका बौद्धिक स्तर सभी लोग अच्छे से जानते है। अब बस भाजपा को इनके दबाव में न आ कर अच्छा काम करना है ताकि अगले इलेक्शन में इनकी भी जरुरत न पड़े।
कांग्रेस के बारे में बोलना पता नहीं सही है या नहीं क्योंकि उनके हवाई किलों के ध्वस्त होने के बाद भी उनको अक्ल आती है या नहीं ये बता पाना थोड़ा मुश्किल ही है। मैं एमपी का हूँ और अच्छी तरह जानता हूँ की अगर यहाँ के चुनावों में यही के एक नेता की थोड़ी भी दखलंदाज़ी वोटर को दिख जाती है तो यहाँ का वोटर बिदक जाता है और भाजपा को वोट दे देता है। अगर कांग्रेस को वापस आना है एमपी में तो फिर उस नेता की इस प्रदेश में एंट्री बैन करनी होगी नहीं तो शायद अगले १० साल भी कांग्रेस यहाँ नहीं आ सकती है।
 अब कांग्रेस को एक गहरे और वास्तविक आत्ममंथन की जरुरत है।  अगर सही में राहुल जी में उनका भविष्य का प्रधानमंत्री दिखता है तो उन्हें उस दिशा में बहुत  वास्तविक प्रयास अभी से शुरू करने पड़ेंगे।  सबसे  पहले तो राहुल जी को जिम्मेदार बनना पड़ेगा। इस देश के बच्चे को भी समझ आ गया है की कैसे कुछ कांग्रेसी नेतओं ने राहुल जी के आस पास एक भ्रम जाल बना रखा है और वो उनका सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे है।  राहुल जी को ये समझना  पड़ेगा की पहले कांग्रेस ने उनको "युवराज" बनाया तभी मोदी जी ने उनको "शहज़ादा" बनाया।  मोदी जी ने पहले काम किया और दिखाया भी लेकिन आप तो पिछले १० सालों से जिम्मेदारी से भाग रहे थे।  आपके पास मौके थे की आप राजनीति का ककहरा इन १० सालों में सीख सकते थे लेकिन आप तो बस युवराज बने रहे।
राहुल जी को सोचना चाहिए की क्यों जनता आप पर भरोसा नहीं कर पायी। मुझे जो कारण नज़र आ  तो यही है की मनमोहन जी को खुल कर काम नहीं करने दिया गया और सोनिया जी के कन्धों पर बन्दूक रख कर कांग्रेस के कई नेताओं ने उनका शिकार किया।  सारे दल ये बोलते रहे की  मनमोहन जी का जी का रिमोट सोनिया जी के पास है लेकिन असल में वो रिमोट कांग्रेस के कई नेताओं ने सोनिया जी के नाम से इस्तेमाल किया है। अब अगर आपको पीएम बनना है तो भाजपा से सीख लेनी होगी की आप कांग्रेस को सत्ता में नहीं लोगे कांग्रेस को ये एकजुट कोशिश करना पड़ेगी की आपको वो पीएम बनवाए।  आपको एक ऐसी टीम बनानी होगी जो आपके लिए काम करे।  भाजपा के सारे नेता मोदी जी को पीएम बनाने में जुट गए थे और कांग्रेस के सारे नेता आपके भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए थे की ये हमको सत्ता दिलवाएगा और आप लगातार जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।
खैर जो भी हो  अभी तो "अबकी बार मोदी सरकार" और एक आम आदमी (सच्ची वाला ) होने के नाते हम ये उम्मीद करते है कि "अच्छे दिन आ जाये..."

मंगलवार, 6 मई 2014

राजनीति - राजनीति

आजकल के इस चुनावी माहौल मे कई लोगों के कई रंग देखने को मिल रहे है।  जैसे पिछले दिनों शुरू हुई नमो और प्रियंका कि ही ज़ंग देख ले।  मुझे ऐसा लग रहा है कि मुझे ये सब कुछ अपने नज़रियें से भी देखना चहिये कि कौन कैसा है।  मैं एक अदना सा आम आदमी हूँ ( सच्ची मुच्ची वाला आम आदमी "आम आदमी पार्टी" वाला नहीं :) )  और मुझे भी ये सोचने का हक़ है कि मेरे देश की राजनीति ओर जा रही है।
भाजपा ने प्रधानमंत्री पद लिये श्री नरेन्द्र मोदी जी को प्रस्तुत किया है और मोदी जी के पास एक अच्छा राजनैतिक अनुभव भी है । मेरे हिसाब से ये अनुभव उन्हे बहुत फ़ायदा दिला सकता है या यूं  कहे कि दिला रहा है।  लेकिन उनके द्वारा किये कुछ कटाक्ष मुझ जैसे आम आदमी को उनसे दूर भी कर देते है।  हाल ही में जब प्रियंका जी ने " नीच राजनीति" शब्द का प्रयोग किया तब मेरे आम दिमाग मे ये बात आयी कि वो "निम्न या निचले या स्तरहीन राजनीति" की बात कर रही है लेकिन मोदी जी ने उस बात को जातिगत मोड़ दे दिया।  मुझे आश्चर्य है कि विकास के नाम पर सरकार को हर समय घेरने वाले और विकास के नाम पर वोट मांगने वाले व्यक्ति को जातिगत सहानभूति क्यों चाहिए??? या फिर उनको भी लगता है कि हम लोग सिर्फ़ जाति आधारित वोट करते है?? वैसे मोदी जी ने स्मृति ईरानी का  सही उपयोग किया है।  यदि वो जीती तो मोदी को एक बड़े कॉम्पिटिटर कि टेंशन खत्म हो जाएँगी और स्मृति जी से उन्हे राजनैतिक खतरा तो है नहीँ कि उनको बड़ा पद देना पड़े और पड़ा भी तो किसी आयोग का प्रमुख बना देंगे और हार गयीं तो गुज़रात मे जो सालों पहले स्मृति ज़ी ने बोला था उसका हिसाब लेने का मौका मिल जायेगा।  याने चित भी मेरी और पट भी मेऱी। वैसे स्मृति जी से पूछना चाहिए की "चांदनी चौक" से हारने के बाद वो वहाँ कितनी बार गयी थी और अगर गयी थी तो वहाँ से दूबारा चुनाव लड़ने कि हिम्मत क्योँ नहीं जुटा पाई?
मुझे आश्चर्य होता है भाजपा के कई नेताओं पर कि वो या तो पार्टी की अंधरुनी राजनीति क शिकार हो रहें है या अति-आत्मविश्वास उन्हे ले डूब रहा है । जेटली जी इसका एक बड़ा उदाहरण है क्योंकि ज़ीवन भर दिल्ली की राजनीति मे रहने के बाद अपना पहला लोकसभा चुनाव अमृतसर से लड़ने का क्या तुक है??????
राहुल जी कि जितनी बात की जाये कम ही है।  देश की सबसे पुरानी पार्टी मे  नंबर २ की हैसियत रखते है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर खुद कि पहचान नहीं बना पाए है अब तक।  मुझे जो कारण नज़र आये है जिनके चलते राहुल जी कि राह मुश्किल है, उनमे के प्रमुख है उनकी अनुभवहीनता।  मुझे लगता है जब यूपी या दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुये थे तब उन्हे खुद को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने चाहिए था और यदि यूपी मे इस आधार पर कि "आप मुझे जिताओ और राज्य का मुख्यमंत्री बनवाओ", कांग्रेस यूपी मे अपना खोया जनाधार वापिस पा सकती थी लेकिन आप तो शह्जादें नहीं नही युवराज हो और ये युवराजगीरी आपको अब ले डूब रही है।  यूपी में तो कांग्रेस के पास अभी अच्छा नेतृत्व भी नहीं है।  दिल्ली में तो शीला जी नहीं जमने देंगीं।
अब बात करें केजरीवाल जी की। केजरीवाल जी एक ऐसे शख्स है जिन्होने इस देश की जनता में एक नयी उम्मीद जगाई और जगा कर बुझा भी दी।  एक मौका मिला था काम करने का उस मौके को अपने बालहठ के चलते गवां दिया।  वैसे उनका नरेंद्र मोदी जी को टक्कर देने क प्रयास काबिल ए तारीफ़ है लेकिन अब नाकाफ़ी है क्योंकि जनता मे उनकी भगोड़े वाली छवि बन गयी है।
मेरे मन में कुछ सवाल ऐसे है जिनके जवाब मुझे शायद ही कभी मिले, जैसे, "नरेंद्र मोदी दो जगहों से क्यों लडे, क्या इसका सही कारण वो कभी बता पाएंगे???" या "नरेंद्र मोदी सुरक्षित सीट से ही चुनाव क्योँ लडे, क़्या उन्हे हार जाने का  डर है????" । "राहुल गांधी ने मौका होते हुये भी अनुभव लेने कि कोशिश क्यों नहीं की ???" या "उनके अपने नहीं चाहते की वो कोइ अनुभव ले???"।
  मुझे लगता है कि मोदी जी को अति-आत्मविश्वास से, राहुल जी को चाटुकार लोगों से और केजरीवाल जी को दोनों से बचने की जरुरत है । मोदी जी जाति पर नहीं विकास पर वोट मांगिये क्योंकि अगर किसी भी कारण से "अबकी बार मोदी सरकार" नहीं बन पायी तो आपकी वापसी मुश्किल हो जायेगी, आडवाणी जी का हश्र तो आप देख ही चुके है । राहुल जी अब आपकी पार्टी का जाना तय है तो आत्ममंथन करें और अपनी पार्टी के कुछ बड़बोले लोगों से सावधान रहें । केजरीवाल जी आप चने के झाङ पर चढ़ना बन्द कर दें और हकीकत की दुनिया मे रह कर काम करें ।

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अवसरवाद

आज की तारीख में अवसरवादिता हर जगह पर है क्योंकि सभी को यही सिखाया जा रहा है कि जो भी अवसर मिले बस पकड़ लो, सही है या गलत ये तो बिलकुल मत सोचो । अभी कुछ दिन पहले जब मैंने देखा कि राम विलास पासवान ने एन डी ए का दामन थाम लिया है तो मैंने कहा कि ये अवसरवादिता का एक बड़ा उदाहरण है । पासवान ये जानते है कि अब यू पी ए कि वापसी सम्भव नहीं है और भाजपा का सत्ता में आना लगभग तय है तो क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लिए जाए और मंत्री पद पक्का कर लिया जाए । वैसे पासवान ये करने वाले पहले व्यक्ति नहीं है फ़ारुक़ अब्दुल्ला ये काम पहले से करते आ रहे है । नेताओं के ये कदम कही से भी अप्रत्याशित नहीं है बस दुःख तो ये देख कर होता है कि बिना ईमान के ये नेता संसद तक क्यों पहुँच जाते है ?
बॉलीवुड में भी अवसरवादिता किस तरह से फैली है ये तो आप किसी भी अखबार या न्यूज़ चैनल ( वैसे आज कल ये न्यूज़ चैनल को न्यूज़ चैनल ना बोलते हुए व्यूज चैनल बोला जाना चहिये।) के माध्यम से पता लगा सकते है  और न्यूज़ चैनल तो अवसरवाद में राजनीतिज्ञों को पीछे छोड़ना चाहते है ।
खेलों में भी आप अवसरवादिता को आसानी से देख सकते हो और उसका ताज़ा उदाहरण है धोनी का एशिया कप न खेलना । लगातार हार के कलंक से बचने के लिए ही धोनी ने ये कदम उठाया है । हम लगातार हार रहे है और धोनी को ये मालूम है कि हम अभी और हारेंगे क्योंकि हमने कोई तैयारी नहीं की है तो क्यों ना चोट का बहाना ही बना लिया जाए । वैसे धोनी को कितनी चोट लगी है ये अब पता चल ही रहा है क्योंकि बी सी सी आई ने सर्वोच्च न्यायालय में ये अपील की है कि खिलाड़ियों के नाम सार्वजनिक न किये जाए ।

बुधवार, 22 जनवरी 2014

दिल्ली दरबार

हाँ तो ऐसा है न कि केजरीवाल जी तबादले नाम के झुनझुने से मान  गए है । परदे के पीछे की कहानी न्यूज़ चैनल वाले कुछ - कुछ बता तो रहे थे पर हम फिर भी कहना चाहेंगे कि परदे के पीछे की कहानी हमें तो पता नहीं है । वैसे जो भी हुआ है अच्छा ही हुआ है क्योंकि अभी इन नौटंकियों का समय नहीं है ।
अभी तो हमें गणतंत्र दिवस कि तैयारियों में  ध्यान लगाना चाहिए क्योंकि केजरीवाल जी कि कृपा से दो दिन वैसे भी बड़ी मुश्किल से बीते है । मुझे नहीं पता कि केजरीवाल जी के मन में क्या है लेकिन मेरे मन में तो यही है कि ये समय सही नहीं था इस तरह बेवजह आम आदमी को परेशान करने के लिये । राजनीति चाहे अच्छी मंशा से हो या बुरी मंशा से मुझे लगता है राजनीति में अहं कि जगह नहीं होती है । वैसे ये भी सोचने कि बात है आज के परिप्रेक्ष्य में कि क्या राजनीति अच्छी मंशा से भी हो सकती है?
केजरीवाल जी ने कहा है कि जो किया सही किया । अब सही या गलत का सबका अपना-अपना अर्थ होता है और मेरे पास भी ये अधिकार तो है कि मैं घटनाओं को अपने तराजू में तौल सकता हूँ । मेरा मानना है कि जो हुआ गलत ही हुआ है और इसके पीछे कई कारण है । इन कारणों में से कुछ कारण जो मुझे अभी याद है, आप लोगों के साथ साझा करने कि कोशिश करता हूँ । 
पहला कारण जो मुझे लगता है वो ये है कि समय गलत था । इस समय जब दिल्ली हाई अलर्ट पर रहती है उस समय दिल्ली के प्रथम नागरिक को इस तरह कि हरकत शोभा नहीं देती है । आपकी इस हरकत से आम आदमी की सुरक्षा में कितनी बड़ी सेंधमारी हो सकती है इसका अगर आपको अंदाज़ा भी नहीं है तो आपको इस पद पर रहने का अधिकार मेरे हिसाब से तो नहीं है । 
दूसरा कारण ये है कि आप राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हो और अगर आप किसी समस्या के लिए देश के गृहमंत्री से मिलना अपनी बेइज्जती समझते हो तो आपको आत्ममंथन कि आवश्यकता है न कि अनशन कि नौटंकी करने कि । 
तीसरा कारण ये है कि आप एक तरीका जो कि आपके संविधान ने तय किया है उसको अपनाते और अगर फिर कोई आपकी बात नहीं सुनता तो आप अनशन करते और तब देखते कि ये आम आदमी आपको अपना पूर्ण समर्थन देता । 
आप अपने अहं कि वजह से गृहमंत्री से नहीं मिले और आपने सबको परेशान किया । आपका कहना है कि आप दिल्ली के मुख्यमंत्री हो और आपको दिल्ली पुलिस नहीं बता सकती है कि आपको क्या करना चाहिए तो केजरीवाल जी आपको बता दे कि दिल्ली पुलिस राष्ट्रीय राजधानी की पुलिस है और दिल्ली को राज्य के समकक्ष दर्जा सिर्फ इसलिए दिया गया है क्योंकि उसको किसी प्रदेश में शामिल नहीं किया जा सकता है और दिल्ली कि मुलभुत समस्याओं के निराकरण के लिए एक संवेधानिक संस्था की आवश्यकता है । 
दिल्ली पुलिस को अगर आपके या दिल्ली के मुख्यमंत्री के हवाले कर दिया तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र कि सुरक्षा राजनीति में फंस कर खतरे में पड़ सकती है । कैसे ये बताने कि आवश्यकता अब इस अनशन काण्ड के बाद तो नहीं होना चाहिए । अब जो आपका रूप आम आदमी देख रहा है वो तो यही सोच रहा है कि अब केजरीवाल हम से मैं बन गए है । 
मैं (ये मेरा वाला है आपका नहीं ) ये बात तो कह सकता हूँ कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो मान लीजिए कि ६ महीने बाद आपकी सरकार गिर जाती है तो दुबारा नहीं आ पायेगी । इस घटना को एक सबक के रूप में लीजिये और कोशिश कीजिये कि आपके कारण आम आदमी परेशान न हो । 
और जाते जाते कुछ अलग बात करते है और वो अलग बात ये है कि भारत फिर हार गया और नंबर १ कि कुर्सी के बेदखल हो गया, है न अलग बात :)

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

केजरीवाल का बालहठ

"If you don't like the rule, follow the rule, reach the top and change the rule..."

ये पंक्तियाँ मैंने कहीं पढी थी और मुझे सही भी लगी थी लेकिन आजकल केजरीवाल जी के तथाकथित आंदोलनों को देख कर लग रहा है कि वो सिर्फ सत्ता सुख चाहते है उन्हें आम आदमी या आम आदमी को परेशान करने वाले नियमों से कोई लेना-देना नहीं है । ताज़ा आंदोलन तो इसी बात को प्रदर्शित कर रहा है । उन्हें दिल्ली की जनता ने एक मौका ये सोच कर दिया है कि ये बंदा परिवर्तन लायेगा लेकिन वो तो अब बस अपनी ताक़त को बढाने में लग गए है ।
मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि क्यों केजरीवाल दिल्ली कि पुलिस के मुद्दे को सही तरीके से हल नहीं करना चाहते है । हर बात को करने का एक तरीका होता है और अगर हमें वो तरीका पसंद नहीं है और हमारे पास उससे बेहतर तरीका है तो हमें अपने आप को इस काबिल बनाना चाहिए कि हम बदलाव कर सके न कि इस तरह गैर ज़िम्मेदाराना तरीके अपनाने चाहिए । आप एक प्रदेश के मुख्यमंत्री हो और उस पद कि गरिमा रखना आपका दायित्व है ।  आप तो बस जा कर धरने पर बैठ गए, आपने ये क्यों नहीं सोचा कि गणतंत्र दिवस पास में है और आप जिस क्षेत्र के मुख्यमंत्री हो वो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी है । अगर कल को कुछ भी उंच-नीच हो जाती है तो उसकी जिम्मेदारी तो आप झट से केंद्र सरकार पर डाल दोगे कि इनकी गलती क्योंकि पुलिस तो इनके मातहत काम करती है , आप ये नहीं सोचना चाहते हो कि यदि आप अभी ये मुद्दे इस तरह से उठाओगे तो पुलिस को कितनी परेशानी होगी ।
इस समय पूरा ध्यान गणतंत्र दिवस पर होना चाहिए कि उस समय कोई अनहोनी न हो और आपको इसमें सहयोग करना चाहिए न कि बच्चो सामान ज़िद पर अड़ जाना । इस समय आम जनता कि सुरक्षा कि चिंता होनी चाहिए न कि अपने मंत्री को बचाने की कवायद कि जानी चाहिए । आपके इस आंदोलन से आम जनता को तो स्पष्ट नज़र आ रहा है कि ये आपके और आपके मंत्री कि अहं कि लड़ाई है और कुछ नहीं ।
आपका कहना है कि मेट्रो स्टेशन आपने बंद नहीं करवाये केंद्र ने करवाये है और पुलिस ने करवाये है । ठीक है माना उन्होंने करवाये है लेकिन कारण तो आप ही हो न आप मानो या न मानो । अगर आपके अनशन का फायदा उठा कर अराजक तत्त्व मेट्रो में फ्री घूस जाते है और उत्पात मचाते है तो उसका जिम्मेदार तो आप केंद्र और पुलिस को बोल दोगे बिना ये सोचे के उनको गणतंत्र दिवस के पहले बहुत सी तैयारियां करनी होती है और हर जगह सघन तलाशी अभियान चलाने होते है । ऐसे में वो आपके अनशन स्थल के आस-पास ध्यान दे या पूरी दिल्ली कि सुरक्षा पर ध्यान दे ।
केजरीवाल जी आपको जनता ने मौका दिया है उसको इस तरह गवाओं नहीं । ये जो आप कर रहे हो ये बालहठ से ज्यादा कुछ नहीं है । अगर वाकई कुछ करना चाहते हो तो एक प्रक्रिया का पालन करो । अगर उस प्रक्रिया से हल नहीं निकलता है तो जहाँ कमी है वहाँ पहुँचने कि कोशिश करो और प्रक्रिया बदलो यूँ आम जनता को परेशान नहीं करो ।
और हाँ जब दिल्ली में निर्भया बलात्कार हुआ था तब आपने शीला दीक्षित को इसका ज़िम्मेदार माना था और उनके इस बयान पर कि दिल्ली पुलिस उनके अधीन नहीं है कहा था कि वो बहाना बना रही है और मुद्दों से भटका रही है और अब आप भी इस अनशन कि नौटंकी से वही तो कर रहे हो । 
बुधवार, 15 जनवरी 2014

भारतीय राजनीति : आजकल

भारतीय राजनीति आजकल एक नए दौर से गुजर रही है । इस नए दौर में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं ।  अरविन्द केजरीवाल ने जब से आम आदमी पार्टी या यूँ कहे कि आप का गठन किया है तब से इस दौर कि  शुरुआत मानी जा सकती है ।  जब आप का गठन हुआ था तब सभी पार्टियों ने इस नयी पहल को बहुत हलके में  था लेकिन दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों के बाद स्थितियाँ  बहुत बदल गयी है ।
दिल्ली विधानसभा चुनावों ने भारत कि सभी राजनैतिक पार्टियों को एक अति-महत्वपूर्ण सिख दी है कि सुधर जाओ नहीं तो खत्म कर दिए जाओगे । वैसे दिल्ली केजरीवाल का कर्मक्षेत्र रहा है और मेरे हिसाब से सिर्फ वहाँ मिली सफलता से आप को अतिउत्साहित नहीं होना चाहिए जो कि आजकल नज़र आ रहा है ।
कुमार विश्वास का अमेठी से चुनाव लड़ना मेरे हिसाब से उस अति उत्साह का ही नतीज़ा है । आप को लगता है कि जैसे वो दिल्ली में शीला दीक्षित को हरा सकते है वैसे ही अमेठी में राहुल गांधी को हरा देंगे तो मेरा यह मानना है कि शीला दीक्षित को खुद अरविन्द केजरीवाल ने हराया था और कुमार विश्वास चाह कर भी केजरीवाल नहीं बन सकते है । अमेठी में राहुल गांधी ने एक सांसद के तौर पर बहुत काम किया है और उनकी पार्टी कि धूमिल होती छवि से उन्हें शायद ही कोई व्यक्तिगत नुक़सान हो ।
आप नेता योगेन्द्र यादव जी का कहना कहना है कि मुकाबला आप और बीजेपी में है और कांग्रेस कहीं भी तस्वीर में नहीं हैं । योगेन्द्र जी कांग्रेस का तो इस बार बुरा हाल होना तय था चाहे आप होती या न होती, आप के आ जाने से नुक़सान बीजेपी को ही होगा । मुझे और बीजेपी के ताज़ा बयानों को देख कर ऐसा लगता है कि आप और बीजेपी कि लड़ाई में कांग्रेस को फायदा हो सकता है क्योंकि आप के आने से बीजेपी का वोट बैंक आप की तरफ जा सकता है और अगर ऐसा हुआ तो कम वोट के सहारे ही सही कांग्रेस नुकसान को कम सकती है । भैया ऐसा है कि दो बिल्लियों कि लड़ाई में अक्सर फायदा बन्दर को हो जाता है ।
नमो आप से डर गए है क्योंकि यदि आप ने उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में अपने उम्मीदवार उतार दिए तो नुक़सान सबसे ज्यादा बीजेपी को ही होगा । उत्तर प्रदेश में आप समेत ५ पार्टियां प्रमुखता से चुनाव लड़ेंगी और सपा-बसपा के वजूद को नकारना गलत होगा । महाराष्ट्र में तो शिव सेना, राज ठाकरे, एन सी पी की पकड़ बहुत ज्यादा है तभी तो बीजेपी को शिव सेना और कांग्रेस को एन सी पी का सहारा है । हाँ मध्य प्रदेश और गुजरात में कोई बड़ा नुक़सान बीजेपी को होता नज़र नहीं आ रहा है लेकिन नमो को प्रधानमंत्री बनना है तो बीजेपी को एकला चलो ही अपनाना पड़ेगा ।
वैसे आप और कांग्रेस दोनों आजकल एक ही समस्या से दो चार हो रहे है और वो है उनके भस्मासुर । दोनों ही पार्टियों के पास भस्मासुरों कि कमी नहीं और अगर समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो दोनों को नुकसान होना तय है । मुझे नहीं लगता कि मुझे यहाँ आप या कांग्रेस को भस्मासुरों  बताने ज़रूरी हैं ।
अंततः मुझे जो समझ आया है अभी तहतक वो यह है कि बीजेपी पूरी ताकत से नमो को प्रधानमंत्री बनाना छह रही है, कांग्रेसी राहुल पार्को जितवाने कि कोशिश करने की जगह उनसे ये उम्मीद पाले बैठे है कि ये हमें जितवाएगा और आप तो बस आप है उनको क्या कहें...