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सोमवार, 14 सितंबर 2015

ज़मीर

हम तो दफ़न कर देते है इसे अपनी सहूलियतों के हिसाब से,
अंधेरों में ही सही लेकिन मैं हूँ इसका अहसास देता है ये,
क्यों नहीं है मुस्कुराने का वक़्त हमारे पास,
हमें अपनी क़द्र करने का वक़्त देता है ये,
कभी गुनाह से पहले, कभी गुनाह के बाद,
जाग कर अपने वज़ूद का सबूत देता है ये,
गर मानते है हम हर बात इसकी,
खुद में खुदा होने सा अहसास देता है ये,
नहीं देता है ये हमें कभी धोखा,
गलत होने पर ज़रूर टोकता है ये,
क्यों बेच देते है हम इसे चंद खुशियों के लिए,
ईमानदार कोशिशों से मुफ्त में मिलता है ये,
हम क्यों इसे मारते है अपनी खामोशियों से इसे,
ये ही तो है जो हमारी रूह को सुकून देता है ,
मेरे ज़मीर इस मतलबी दुनिया में माना की है मुश्किल,
जगा कर रख सकू तुझे ऐसी राह खोज रहा हूँ मैं.…



मंगलवार, 28 जुलाई 2015

धन्यवाद कलाम सर...

डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम नहीं रहे । २७ जुलाई  २०१५ एक ऐसा दिन है जिस दिन भारत ने एक सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रपति, एक अद्भुत वैज्ञानिक, एक महान शिक्षक और एक सरल इंसान को खोया है । मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि मैं उनके युग का हिस्सा बना हूँ । कलाम सर एक ऐसे व्यक्ति थे जिनका जीवन, जिनके विचार, जिनका व्यवहार सब कुछ प्रेरणादायी था ।
जब वो राष्ट्रपति बने थे तब मेरे मन में एक विचार आया था कि, क्या यह व्यक्ति वाकई राष्ट्रपति बनने लायक है या सिर्फ पोखरण के सफल परिक्षण का इनको इनाम दिया गया है?? फिर जब मैंने सर को पहली बार ध्यान से सुना तो मैं दंग रह गया था कि भारत में अभी भी ऐसे लोग  मौजूद है और वो इतने बड़े पद पर आ सकते है? मैं शर्मिंदा महसूस कर रहा था कि मेरा आकलन कितना गलत था ।
जब वो राष्ट्रपति थे और भारतीय राजनीति और राजनीतिज्ञों पर बेबाक टिप्पणी करते थे तब मैं हमेशा ये सोचता था कि ये व्यक्ति शायद दुबारा राष्ट्रपति न बन पाये क्योंकि ये राजनीतिज्ञों को बेबाकी से आइना दिखा देता है और हुआ भी कुछ ऐसा ही । मुझे बहुत दुःख हुआ था कि आखिर क्यों भारतीय जनता को इतना अधिकार नहीं है की वो अपना राष्ट्रपति खुद चुन सके क्योंकि अगर ऐसा होता तो आज भी वो हमारे माननीय राष्ट्रपति होते ।
सर एक कर्मशील व्यक्ति थे और उनकी हमेशा से ये इच्छा थी की उन्हें एक शिक्षक के रूप में लोग याद रखे न की एक पूर्व राष्ट्रपति के रूप में । उनकी ज्ञानार्जन की ये प्रबल इच्छा ही थी जिसके कारण वो अपने अंतिम समय में वही कर रहे थे जो वो चाहते थे । एक शिक्षक ये लिए इससे अच्छा अंत क्या हो सकता है की वो एक शिक्षण संस्थान में पढ़ाते हुए अपनी अंतिम सांस ले । जाते-जाते भी वो हमें ये शिक्षा दे गए की अगर आप अपना काम ईमानदारी से कर रहे हो तो ईश्वर भी आपकी इच्छओं का ध्यान रखता है ।
कलाम सर ने न सिर्फ हमें एक विज़न दिया है अपितु हमें उस विज़न को पाने का रास्ता भी दिखाया है । अब हमारी बारी है की हम मिल कर उनके विज़न पर काम करे और २०२० तक उनके विज़न को साकार करने की दिशा में कदम उठाएं । हम सब कुछ भले न कर पाये लेकिन ये शपथ ले की हमसे जितना हो सकेगा हम अपने देश को अपने समाज को देने की कोशिश करेंगे ।
अंततः  वो एक वट वृक्ष है जिसने अपनी शाखाओं को इतना मजबूत कर लिया है की वो कभी गिर ही नहीं पायेगा । 
शनिवार, 17 मई 2014

अच्छे दिन आ सकते है???

इलेक्शन हो गए और अबकी बार मोदी सरकार भी बन गयी।  हमें मोदी जी को बधाई देनी चाहिए, इसलिए नहीं की वो देश के नए प्रधानमंत्री बनने वाले है बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने एक लॉन्ग टर्म विज़न के साथ एक असंभव सा दिखने वाला काम कर दिखाया है।  १९८४ के बाद इस देश की राजनीति ने बहुत अस्थिरता देखी है। इस देख ने लगातार चुनाव झेले भी है।  श्री अटल बिहारी वाजपाई जी ने एक प्रयास किया था सबको साथ रख कर सरकार चलने का जिसमे वो तो पूरी तरह सफल नहीं हो पाये थे लेकिन उनसे सीख कर कांग्रेस ने ये काम १० सालों तक किया।  मोदी जी ने कांग्रेस के इन १० सालों के शासन को बहुत करीब से देखा है और हमें उनकी सोच की दाद देनी चाहिए की उन्होंने कांग्रेस की गलतियों को बड़ी बारीकी से न सिर्फ समझा साथ ही उनका सही फायदा भी उठाया और इसी के चलते उनकी पहली कोशिश ये थी की बहुमत को भाजपा खुद हासिल करे। आज जब क्षेत्रीय दल अपनी बेजा डिमांड के परेशान करते है ऐसे समय मोदी जी की ये सोच एकदम सही है।
इस बार जो सरकार बनी है उसमे यूपी, राजस्थान, गुजरात, एमपी, छत्तीसगढ़, दिल्ली और उत्तराखंड की महती भूमिका रही है।  इन ७ राज्यों ने भाजपा को १७० के करीब सीट्स दी है। दिल्ली, उत्तराखंड, गुजरात और राजस्थान में तो कोई और दल अपना खाता भी नहीं खोल पाया है जो की एक अभूतपूर्व बात है।  अब मोदी जी को दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनाने की कोशिश करना चाहिए ताकि अगले इलेक्शन में वहाँ के क्षेत्रीय दलों का भी सफाया हो जाए और भारत में मजबूत सरकार बनाने का जो रास्ता मोदी ने री-ओपन किया है वो हमेशा खुला ही रहे।
भारत एक बहूत विशाल लोकतंत्र है और क्षेत्रीयता के आधार पर वोट मांगने वालों की यहाँ  भरमार है।  मुझे कभी-कभी बहुत दुःख होता है ये देख कर की कैसे मिली-जुली सरकार में ये दल अपना उल्लू सीधा करते है और वोटर उल्लू बना सब देखता रहता है और फिर अगले इलेक्शन में वही गलती दोहराता है। मोदी जी ने भाजपा को २७२ से ज्यादा सीट्स दिलवाकर ये एक बहुत अच्छा काम किया है।  मुझे उम्मीद है की ये भाजपा सरकार (एनडीए सरकार नहीं ) अच्छा काम करें।  मुझे डर लगता है इनके कुछ साथियों से क्योंकि उनका बौद्धिक स्तर सभी लोग अच्छे से जानते है। अब बस भाजपा को इनके दबाव में न आ कर अच्छा काम करना है ताकि अगले इलेक्शन में इनकी भी जरुरत न पड़े।
कांग्रेस के बारे में बोलना पता नहीं सही है या नहीं क्योंकि उनके हवाई किलों के ध्वस्त होने के बाद भी उनको अक्ल आती है या नहीं ये बता पाना थोड़ा मुश्किल ही है। मैं एमपी का हूँ और अच्छी तरह जानता हूँ की अगर यहाँ के चुनावों में यही के एक नेता की थोड़ी भी दखलंदाज़ी वोटर को दिख जाती है तो यहाँ का वोटर बिदक जाता है और भाजपा को वोट दे देता है। अगर कांग्रेस को वापस आना है एमपी में तो फिर उस नेता की इस प्रदेश में एंट्री बैन करनी होगी नहीं तो शायद अगले १० साल भी कांग्रेस यहाँ नहीं आ सकती है।
 अब कांग्रेस को एक गहरे और वास्तविक आत्ममंथन की जरुरत है।  अगर सही में राहुल जी में उनका भविष्य का प्रधानमंत्री दिखता है तो उन्हें उस दिशा में बहुत  वास्तविक प्रयास अभी से शुरू करने पड़ेंगे।  सबसे  पहले तो राहुल जी को जिम्मेदार बनना पड़ेगा। इस देश के बच्चे को भी समझ आ गया है की कैसे कुछ कांग्रेसी नेतओं ने राहुल जी के आस पास एक भ्रम जाल बना रखा है और वो उनका सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे है।  राहुल जी को ये समझना  पड़ेगा की पहले कांग्रेस ने उनको "युवराज" बनाया तभी मोदी जी ने उनको "शहज़ादा" बनाया।  मोदी जी ने पहले काम किया और दिखाया भी लेकिन आप तो पिछले १० सालों से जिम्मेदारी से भाग रहे थे।  आपके पास मौके थे की आप राजनीति का ककहरा इन १० सालों में सीख सकते थे लेकिन आप तो बस युवराज बने रहे।
राहुल जी को सोचना चाहिए की क्यों जनता आप पर भरोसा नहीं कर पायी। मुझे जो कारण नज़र आ  तो यही है की मनमोहन जी को खुल कर काम नहीं करने दिया गया और सोनिया जी के कन्धों पर बन्दूक रख कर कांग्रेस के कई नेताओं ने उनका शिकार किया।  सारे दल ये बोलते रहे की  मनमोहन जी का जी का रिमोट सोनिया जी के पास है लेकिन असल में वो रिमोट कांग्रेस के कई नेताओं ने सोनिया जी के नाम से इस्तेमाल किया है। अब अगर आपको पीएम बनना है तो भाजपा से सीख लेनी होगी की आप कांग्रेस को सत्ता में नहीं लोगे कांग्रेस को ये एकजुट कोशिश करना पड़ेगी की आपको वो पीएम बनवाए।  आपको एक ऐसी टीम बनानी होगी जो आपके लिए काम करे।  भाजपा के सारे नेता मोदी जी को पीएम बनाने में जुट गए थे और कांग्रेस के सारे नेता आपके भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए थे की ये हमको सत्ता दिलवाएगा और आप लगातार जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।
खैर जो भी हो  अभी तो "अबकी बार मोदी सरकार" और एक आम आदमी (सच्ची वाला ) होने के नाते हम ये उम्मीद करते है कि "अच्छे दिन आ जाये..."

मंगलवार, 6 मई 2014

राजनीति - राजनीति

आजकल के इस चुनावी माहौल मे कई लोगों के कई रंग देखने को मिल रहे है।  जैसे पिछले दिनों शुरू हुई नमो और प्रियंका कि ही ज़ंग देख ले।  मुझे ऐसा लग रहा है कि मुझे ये सब कुछ अपने नज़रियें से भी देखना चहिये कि कौन कैसा है।  मैं एक अदना सा आम आदमी हूँ ( सच्ची मुच्ची वाला आम आदमी "आम आदमी पार्टी" वाला नहीं :) )  और मुझे भी ये सोचने का हक़ है कि मेरे देश की राजनीति ओर जा रही है।
भाजपा ने प्रधानमंत्री पद लिये श्री नरेन्द्र मोदी जी को प्रस्तुत किया है और मोदी जी के पास एक अच्छा राजनैतिक अनुभव भी है । मेरे हिसाब से ये अनुभव उन्हे बहुत फ़ायदा दिला सकता है या यूं  कहे कि दिला रहा है।  लेकिन उनके द्वारा किये कुछ कटाक्ष मुझ जैसे आम आदमी को उनसे दूर भी कर देते है।  हाल ही में जब प्रियंका जी ने " नीच राजनीति" शब्द का प्रयोग किया तब मेरे आम दिमाग मे ये बात आयी कि वो "निम्न या निचले या स्तरहीन राजनीति" की बात कर रही है लेकिन मोदी जी ने उस बात को जातिगत मोड़ दे दिया।  मुझे आश्चर्य है कि विकास के नाम पर सरकार को हर समय घेरने वाले और विकास के नाम पर वोट मांगने वाले व्यक्ति को जातिगत सहानभूति क्यों चाहिए??? या फिर उनको भी लगता है कि हम लोग सिर्फ़ जाति आधारित वोट करते है?? वैसे मोदी जी ने स्मृति ईरानी का  सही उपयोग किया है।  यदि वो जीती तो मोदी को एक बड़े कॉम्पिटिटर कि टेंशन खत्म हो जाएँगी और स्मृति जी से उन्हे राजनैतिक खतरा तो है नहीँ कि उनको बड़ा पद देना पड़े और पड़ा भी तो किसी आयोग का प्रमुख बना देंगे और हार गयीं तो गुज़रात मे जो सालों पहले स्मृति ज़ी ने बोला था उसका हिसाब लेने का मौका मिल जायेगा।  याने चित भी मेरी और पट भी मेऱी। वैसे स्मृति जी से पूछना चाहिए की "चांदनी चौक" से हारने के बाद वो वहाँ कितनी बार गयी थी और अगर गयी थी तो वहाँ से दूबारा चुनाव लड़ने कि हिम्मत क्योँ नहीं जुटा पाई?
मुझे आश्चर्य होता है भाजपा के कई नेताओं पर कि वो या तो पार्टी की अंधरुनी राजनीति क शिकार हो रहें है या अति-आत्मविश्वास उन्हे ले डूब रहा है । जेटली जी इसका एक बड़ा उदाहरण है क्योंकि ज़ीवन भर दिल्ली की राजनीति मे रहने के बाद अपना पहला लोकसभा चुनाव अमृतसर से लड़ने का क्या तुक है??????
राहुल जी कि जितनी बात की जाये कम ही है।  देश की सबसे पुरानी पार्टी मे  नंबर २ की हैसियत रखते है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर खुद कि पहचान नहीं बना पाए है अब तक।  मुझे जो कारण नज़र आये है जिनके चलते राहुल जी कि राह मुश्किल है, उनमे के प्रमुख है उनकी अनुभवहीनता।  मुझे लगता है जब यूपी या दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुये थे तब उन्हे खुद को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने चाहिए था और यदि यूपी मे इस आधार पर कि "आप मुझे जिताओ और राज्य का मुख्यमंत्री बनवाओ", कांग्रेस यूपी मे अपना खोया जनाधार वापिस पा सकती थी लेकिन आप तो शह्जादें नहीं नही युवराज हो और ये युवराजगीरी आपको अब ले डूब रही है।  यूपी में तो कांग्रेस के पास अभी अच्छा नेतृत्व भी नहीं है।  दिल्ली में तो शीला जी नहीं जमने देंगीं।
अब बात करें केजरीवाल जी की। केजरीवाल जी एक ऐसे शख्स है जिन्होने इस देश की जनता में एक नयी उम्मीद जगाई और जगा कर बुझा भी दी।  एक मौका मिला था काम करने का उस मौके को अपने बालहठ के चलते गवां दिया।  वैसे उनका नरेंद्र मोदी जी को टक्कर देने क प्रयास काबिल ए तारीफ़ है लेकिन अब नाकाफ़ी है क्योंकि जनता मे उनकी भगोड़े वाली छवि बन गयी है।
मेरे मन में कुछ सवाल ऐसे है जिनके जवाब मुझे शायद ही कभी मिले, जैसे, "नरेंद्र मोदी दो जगहों से क्यों लडे, क्या इसका सही कारण वो कभी बता पाएंगे???" या "नरेंद्र मोदी सुरक्षित सीट से ही चुनाव क्योँ लडे, क़्या उन्हे हार जाने का  डर है????" । "राहुल गांधी ने मौका होते हुये भी अनुभव लेने कि कोशिश क्यों नहीं की ???" या "उनके अपने नहीं चाहते की वो कोइ अनुभव ले???"।
  मुझे लगता है कि मोदी जी को अति-आत्मविश्वास से, राहुल जी को चाटुकार लोगों से और केजरीवाल जी को दोनों से बचने की जरुरत है । मोदी जी जाति पर नहीं विकास पर वोट मांगिये क्योंकि अगर किसी भी कारण से "अबकी बार मोदी सरकार" नहीं बन पायी तो आपकी वापसी मुश्किल हो जायेगी, आडवाणी जी का हश्र तो आप देख ही चुके है । राहुल जी अब आपकी पार्टी का जाना तय है तो आत्ममंथन करें और अपनी पार्टी के कुछ बड़बोले लोगों से सावधान रहें । केजरीवाल जी आप चने के झाङ पर चढ़ना बन्द कर दें और हकीकत की दुनिया मे रह कर काम करें ।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

Irresponsible or not responsible

लोकसभा चुनाव चल रहे है । देश में अलग-अलग लहरें भी चल रही है । हर दल को उसके नेता की लहर नज़र आ रही है । तरह-तरह के अघोषित प्रायोजित ओपिनियन पोल भी समाचार चैनलों पर आ रहे है । कुल मिला कर हम अभी चुनाव में घिरे हुए है ।
मैंने सोचा की चलो कुछ चुनाव से सम्बन्धित ही खोजे तो मैंने खोजना चालू किया कि आखिर एक सांसद की उसके संसदीय क्षेत्र के प्रति जिम्मेदारियां क्या होती है? जब मैं खोज रहा था तब मुझे लोकसभा की वेबसाइट भी देखने को मिली जिसमे कही पर भी इस बात का कोई जिक्र नहीं था की एक सांसद किन बातों के लिए जिम्मेदार है और ये देख कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ की लोकसभा भी ये बताने को तैयार नहीं है की उसके सदस्यों की क्या जिम्मेदारियां है । वैसे इस खोज में मुझे टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक खबर जरूर मिल गयी जिसमे लिखा था कि आर टी आई कार्यकर्ता श्री देव आशीष भट्टाचार्य के द्वारा मांगी गयी जानकारी से ये पता चला है कि विधानसभा या संसद सदस्यों की उनके क्षेत्र के प्रति कोई जिम्मेदारियां नहीं होती है ?????????
मैं हर बार वोट देता हूँ और इसे अपनी जिम्मेदारी मानता हूँ लेकिन जब इस तरह की खबरें पढ़ने को मिलती है तो मुझे लगता है की मेरे वोट का कोई अर्थ है क्या, क्योंकि जिसे मैं चुन रहा हूँ वो मेरे प्रति कहीं पर भी लिखित में जिम्मेदार नहीं है । वैसे ऐसा होता भी है, मैं भोपाल संसदीय क्षेत्र में रहता हूँ और मुझे यकीन है की मेरे मौजूदा सांसद मेरे क्षेत्र में कभी नहीं आएं होंगे । आज मैं मौजूदा सांसद या इस चुनाव में खड़े किसी भी प्रत्याशी से मेरे क्षेत्र की बात करने जाओ तो मुझे यकीन है वो मेरे क्षेत्र के बारे में कुछ भी नहीं जानते होंगे ।
जनता को वोट देना चाहिए और ये उसका अधिकार और कर्त्तव्य है फिर चाहे वो विकास के लिए पार्षद से लेकर सांसद के बीच झूलता ही क्यों न रहे । मुझे ये लगता है की पार्षद से लेकर सांसद तक सब की जिम्मेदारियां तय होना चाहिए की आपको इतना और ये काम तो करना ही है नहीं तो आप अगली बार चुनाव नहीं लड़ पाएंगे और साथ ही साथ जिस तरह हम कम उपस्तिथी के चलते परीक्षा नहीं दे पाते है वैसे ही जनप्रतिनिधियों की भी उपस्तिथी की गणना होनी चाहिए ।
मैं शायद सपना ही देख रहा हूँ क्योंकि जो मैं चाहता हूँ वो संभव नहीं है और जो ये बोलता है की नहीं ये संभव है वो या तो मुझे मुर्ख समझता है या खुद को मुर्ख साबित करना चाहता है । कोई बिल्ली अपने गले में घंटी नहीं बंधना चाहती है ।