कुछ मेरे बारे मे...

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Aditya Dubay
हर जगह ये पूछा जाता है कि अपने बारे मे बताइए (About me), हम ये सोचते है की जो हमें जानते है उन्हें अपने बारे मे बताना ग़लत होगा क्योंकि वो हमें जानते है और जो हमें नही जानते उन्हे हम बता कर क्या करेंगे की हम कौन है | जो हमें नही जानता क्या वो वाकई हमें जानना चाहता है और अगर जानना चाहता है तो उसे About me से हम क्या बताये क्योंकि हम समझते है बातचीत और मिलते रहने से आप एक दूसरे को बेहतर समझ सकते हो About Me से नही | वैसे एक बात और है हम अपने बारे मे बता भी नही सकते है क्योंकि हमें खुद नही पता की हम क्या है ? हम आज भी अपने आप की तलाश कर रहे है और आज तक ये नही जान पायें हैं की हम क्या है? अब तक का जीवन तो ये जानने मे ही बीत गया है की हमारे आस पास कौन अपना है और कौन पराया ? ये जीवन एक प्रश्न सा ज़रूर लगता है और इस प्रश्न को सुलझाने मे हम कभी ये नही सोच पाते है की हम कौन है? कुछ बातें सीखने को भी मिली जैसे आपका वजूद आपके स्वभाव या चरित्र से नही बल्कि आपके पास कितने पैसे है उससे निर्धारित होता है | कुछ लोग मिले जो कहते थे की वो रिश्तों को ज़्यादा अहमियत देते है लेकिन अंतत: ... बहुत कुछ है मन मे लिखने के लिए लेकिन कुछ बातें या यू कहें कुछ यादें आ जाती है और मन खट्टा कर जाती है तो कुछ लिख नही पाते हैं |
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कुछ तो लोग कहेंगे...

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Friday, January 27, 2012

अग्नि पथ

वृक्ष हों भले खड़े, हो घने, हो बड़े,
एक पत्र-छाह भी मांग मत, मांग मत, मांग मत
अग्नि पथ अग्नि पथ अग्नि पथ
तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
ये महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत् रक्त से,
लथ पथ, लथ पथ, लथ पथ ,
अग्नि पथ अग्नि पथ अग्नि पथ
--हरिवंशराय बच्चन
ये कविता जब मुकुल एस आनंद ने सुनी थी तब उन्होंने अपनी निर्माणाधीन मूवी का नाम अग्निपथ रखने का निर्णय लिया था और श्री हरिवंश राय बच्चन जी से इस कविता को अपनी मूवी में इस्तेमाल करने की अनुमति भी मांगी थी ।
१९९० में प्रदर्शित "अग्निपथ" अमिताभ बच्चन की यादगार मूवीस में से एक है और इस बात में कोई दोराय नहीं हो सकती है की उन जैसा कोई नहीं है । मुझे कल नयी अग्निपथ देखने का मौका मिल गया अपने एक मित्र की वजह से तो मैंने सोचा चलो दान की बछिया के दांत नहीं गिनते है और बिना कोई पूर्वनियोजित धारणा के मैं मूवी देखने पहुँच गया ।
मैंने अमिताभ वाली अग्निपथ सिनेमा हॉल में ही देखी थी और कई बार टीवी पर भी देखने का मौका मिला था । ये वो अग्निपथ थी जिस पर चल कर अमिताभ को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था । नयी अग्निपथ के बारे में मुझे ठोड़ी बहुत जानकारी थी और वो ये थी की नया विजय दीनानाथ चौहान हृतिक है और नया कांचा संजय दत्त जो की एक बार फिर मांडवा को हासिल करने के आमने सामने है ।
फिल्म की शुरुआत में मुझे ये समझ आ गया की नयी और पुराणी अग्निपथ की एक समानता है की दोनों फिल्मों के नायकों का लक्ष्य एक ही है - पिता की मौत का बदला लेना और अपने गाँव को वापस हासिल करना । नयी अग्निपथ की शुरुआत और बेहतर हो सकती थी अगर निर्देशक मास्टर दीनानाथ चौहान को हलके में नहीं लेते । मास्टर दीनानाथ चौहान के चरित्र को और बेहतर अभिनेता और बेहतर तरीके से निभा सकता था और कुछ संवाद लेखन भी बेहतर किया जान चाहिए था मसलन "पहलवान" के स्थान पर "ताकतवर" शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि नायक को खलनायक से कुश्ती नहीं लड़ना थी वरन बदला लेना था ।
नयी अग्निपथ में मैंने एक चरित्र को मिस किया है और वो है "नाथू" जो की उस गाँव में मास्टर दीनानाथ के बाद विजय किया एक सच्चा समर्थक था । नयी अग्निपथ में विजय को गाँव वाले उसकी माँ के कारण पहचान पाए थे । नए गायतोंडे के रूप में ओम पूरी ने बहुत अच्छा काम किया है और ज़रीना वहाब ने भी माँ के छोटे से चरित्र को अच्छे से निभाया है और कहीं भी मिथुन दा के कृष्णन अईयर की कमी महसूस नहीं हुयी ।
हमें हृतिक से अमिताभ वाला टोन आपेक्षित नहीं करना चाहिए, दोनों की अपनी पहचान है और इसी कारण हमें ताकत पाने के तरीके की आलोचना नहीं करना चाहिए । हमें ये नहीं सोचना चाहिए की हृतिक भी अमिताभ की तरह हई करेगा । आज का विजय ताक़त पाने के लिए सिर्फ जोश का सहारा नहीं लेता है, वो आज की परिस्तिथि के अनुसार चल कर ताक़त हासिल करता है क्योंकि राउफ लाला (ऋषि कपूर) तरलिन, उस्मान भाई या अन्ना शेट्टी नहीं है । ऋषि कपूर ने राउफ लाला के चरित्र को एक अलग पहचान दी है जो काबिले तारीफ है ।
नयी अग्निपथ में शिक्षा (विजय की बहन) एक स्कूल जाने वाली लड़की है इसलिए उसकी लाइफ में कृष्णन अईयर की आवश्यकता नहीं है जो की मेरी नज़र में सही निर्णय है । नायिका के रूप में प्रियंका ने अच्छा काम किया है लेकिन इस कहानी में नायिका केवल नाचने गाने के लिए ही हो सकती है क्योंकि नायक अपना लक्ष्य उससे मिलने के पहले ही निर्धारित कर चूका है ।
अंत में केवल एक ही बात कही जा सकती है "This movie is not remake it is REPRESENTATION" (जयदीप सिंह गिरनार* जी से साभार ) इसलिए कृपया इसे हृतिक की अग्निपथ समझे अमिताभ की नहीं ।
* जयदीप सिंह गिरनार जी मेरे फेस बुक मित्र है और ९४.३ My FM में मुझे इनके साथ काम करने का मौका भी मिला है ।
Tuesday, October 11, 2011

कृप्या अपने किये की जिम्मेदारी ले...

पता नहीं क्यों लेकिन आज तक मुझे एक बात समझ नहीं आई की हम अपने आप को सही साबित करने के लिए दूसरों को गलत क्यों साबित करना चाहते है | आज कल एक राजनेता ( वैसे तो लोग समय बचाने या आलस के कारण इस प्रजाति को नेता बोलते है किन्तु मैं राजनेता बोलना पसंद करता हूँ ) दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप तो ऐसे लगाता है जैसे कोई प्रतियोगिता चल रही है और सबसे ज्यादा आरोप लगाने वाले को कोई पुरस्कार मिलने वाला है | मुझे अच्छे से जानने वाले ये बात जरुर जानते है की मैं कभी अपनी चीज़ को अच्छा कहने के लिए दूसरों की चीज़ को बुरा नहीं कहता हूँ क्योंकि मुझे लगता है हर व्यक्ति सौ फीसदी अच्छा या बुरा नहीं हो सकता है |
मेरा मानना यह है की अगर आपके पास कुछ है जो की आपकी नज़र में अच्छा है वो बाकि लोगों की नज़र में भी अच्छा हो ये जरुरी नहीं है और आपके पास जो है उसको अच्छा साबित करने के लिए दूसरों पर किसी तरह का आक्षेप लगाना गलत है | अगर हम खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए दूसरों को नीचा दिखाते है या साबित करने की कोशिश करते है तो कही न कही हम अपनी कमजोरी को छिपाना चाह रहे होते है |
हमें हमेशा ध्यान रहना चाहिए की "अह्म ब्रह्मास्मि" का परिणाम कभी सुखद नहीं हो सकता है क्योंकि स्वयं ब्रह्मा भी खुद को सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते है | हम परमात्मा को एक शक्ति के रूप में पूजते है और कर्म और भाग्य में विश्वास भी करते है | कुछ लोग कर्म में विश्वास रखते है और कुछ भाग्य में , लेकिन अंततः हमें जुड़ना उस परमात्मा से ही है |
मैं व्यक्तिगत रूप से स्वयं को सिर्फ अपने ज़मीर के प्रति जवाबदेह मानता हूँ क्योंकि मुझे लगता है की मेरा ज़मीर मुझे मेरे भगवान् से जोड़ता है और अगर कोई शक्ति है जो आपके कर्मों का या आपके भाग्य का लेखा जोखा रख रही है तो वो आपके ज़मीर से आपका मूल्यांकन करवा रही है |
आजकल संचार साधनों के कारण हमें तुरंत पता चल जाता है की किसने किसके लिए क्या क्यों और कब कहा | मुझे लगता है की अगर हम किसी पर एक उंगली उठा रहे है तो बाकि तीन हमारी तरफ है इसलिए हमें किसी की बात से सहमत या असहमत होने का अधिकार तो है लेकिन उसको सही या गलत कहने का अधिकार नहीं है | हमें अपनी बात को मजबूती से रखना चाहिए बजाए दूसरों की बात को गलत साबित करने की कोशिश करने के...
Friday, June 17, 2011

मेरा प्रेक्टिकल न होना...

जब भी मैं अपनी ३१ साला ज़िन्दगी का आंकलन करने की एक असफल सी कोशिश करता हूँ तब-तब मुझे एक बात बहुत परेशान करती है और वो है मेरा प्रक्टिकल न होना...
बचपन से मैं थोडा लीक से अलग चलने वाला बन्दा मानता रहा हूँ खुद को लेकिन जब-जब मैं खुद को अतीत के आईने में देखता हूँ तब-तब मेरा ये भ्रम टूट सा जाता है क्योंकि कहीं ना कहीं जब भी मैंने लीक से हट कर चलने की गुस्ताखी की है मेरे प्रयास को एक अति इमोशनल अंदाज़ में दबा दिया गया है और मैं खुद उस दबाव में आ गया हूँ क्योंकि मैं खुद को प्रेक्टिकल समझता तो हूँ लेकिन असलियत में तो मैं एक इमोशनल व्यक्तित्व का मालिक या यूँ कहे की गुलाम हूँ |
बचपन में जब भी मुझे कोई चाहत होती थी मैं अपने माता-पिता को बताने में हमेशा झिझकता था क्योंकि मेरे मन में हमेशा ये डर रहता था कि कहीं वो ना तो नहीं कर देंगे और अक्सर होता भी यही था | मुझे नहीं पता इस डर के पीछे कारण क्या था लेकिन ऐसा अक्सर होता था |
थोडा बड़ा हुआ तो मैंने आक्रामक रुख अपनाना चालू कर दिया और मन में एक बात को घर करने दिया कि जो आसानी से ना मिले उसे लड़ कर हासिल करो और कई बार मैं सफल भी हुआ लेकिन उस चाहत को पाने कि जो ख़ुशी मुझे महसूस होना चाहिए थी वो मुझे नहीं हो पायी क्योंकि मैं आक्रामक बन रहा था प्रक्टिकल नहीं...
अपने जीवन के कुछ बड़े फैसले मैं लेना चाहता था लेकिन मुझे नहीं लेने दिए गए, हर बार इस समाज कि दुहाई दे कर मेरे अरमानों को नज़र-अंदाज़ कर दिया गया | मैं फिर भी शायद किसी को दोष नहीं दे सकता हूँ क्योंकि गलती मेरी ही थी कि मैंने खुद के बारे में न सोच कर दूसरों के बारे में सोचा और जो खुद के बारे में नहीं सोच सकता है उसके बारे में तो आजकल भगवान्  भी नहीं सोचते है क्योंकि उन्होंने भी आजकल के हिसाब से अपने आप को अपग्रेड कर लिया है और वो भी प्रेक्टिकल हो गए है |
मैं आज जहां हु जिस स्थिति  में हूँ खुद को खुश नहीं रख पा रहा हूँ क्योंकि ये वो लाइफ नहीं है जो मैंने खुद के लिए सोची थी और अभी भी प्रेक्टिकल नहीं हो पा रहा हूँ कि इन परिस्थितियों में भी खुश रहना सीख सकूँ | आज कि दुनिया का एक बहुत महत्वपूर्ण सबक मैंने जो नहीं सिखा है कि या तो इमोशनल हो कर अपने अरमानों को एक संदूक में ताला मार कर गहरे समुन्दर में फेंक दो और वही करो जो दुसरे चाहते है या प्रेक्टिकल बन जाओ | आज कि दुनिया में मेरे जैसे त्रिशंकुओं के लिए कोई जगह नहीं है जिन्हें ये ग़लतफ़हमी है कि वो इमोशनल और प्रेक्टिकल के बीच एक पुल का काम कर सकते है और असल में हम जैसे लोग पुल नहीं त्रिशंकु होते है |
Thursday, December 30, 2010

कुछ अलग करना चाहता हूँ...

करीब-करीब साल भर बाद आज थोडा वक़्त मिला है कुछ लिखने लायक पर बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा है कि क्या लिखा जाए | साल भर में परिस्थितियां बहुत बदल सी गयी लगती है जैसे अब शादीशुदा हूँ और इस बात को हँसते हुए बताऊ या रोते हुए पता नहीं...
अब कुछ बड़ा करने का मन कर रहा है समथिंग रिअली बिग... आजकल ऑफिस में तो ऐसा लगता है जैसे टाइम पास करने आये हुए है और बदकिस्मती से वह भी नहीं कर पाते है और जैसे मन उकताहट कि परिकाष्ठा से गुजर रहा है | आज मैं हिंदुस्तान में बनी पहली एनिमेशन फिल्म देख रहा था तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था कि १९७० के दशक में भी भारतीय एनिमेशन बहुत अच्छा हुआ करता था, शायद आपको याद हो " एक चिड़ियाँ अनेक चिड़ियाँ...", हांजी ये हिंदुस्तान में बनी पहली एनिमेशन फिल्म थी | वैसे आप सोच रहे होंगे कि मैंने बात कि शुरुआत कहा से कि थी और मैं बात को कहाँ ले गया या ले जा रहा हूँ पर क्या करू कुछ लिखना चाहता हूँ और समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखना चाह रहा हूँ :(
कल सोच रहा था कि थोडा स्मिथ को भला-बुरा बोलू, वैसे भला तो क्या बोलता बुरा कि बोलता अगर बोलता तो क्योंकि मैं एक आलोचक हूँ और ऐसा मैं नहीं कहता मेरे आस पास वाले कहते हैं | आजकल लोग ये भूल गए है कि "निंदक नियरे रखिये..." वैसे मुझे कहीं बाहर भी नहीं जाना पड़ता है क्योंकि कुछ लोग मेरे घर में ही मिल जाते है इस तरह के जो निंदक पास नहीं रखना चाहते हैं | मुझसे लोग कहते है कि मैं किसी कि नहीं सुनता पर कोई ये जाने कि कोशिश नहीं करता कि क्यों नहीं सुनता हूँ |
आजकल सबको यही लगता है कि सिर्फ वह ही सही है तो ये मुझे भी लगे कि मैं ही सही हूँ तो इसमें गलत क्या हैं? सब केवल गल्तियाँ गिनाते है तो मैं भी गिनाता हू और इसमें गलत क्या है ????
आज भी मेरे ऑफिस में कुछ काम नहीं हुआ क्योंकि विदेश में सब क्रिसमस और न्यू इयर जो बना रहे है और हम यहाँ रोज़ ८ घंटे उनका इन्तजार कर रहे है कि उनका बन जाए तो हम काम चालू करे क्यों ऑफिस तो आना ही है चाहे काम हो या ना हो |
वैसे अगले कुछ दिनों में मैं कुछ लिखू ना लिखू इसलिए अभी लिख देता हूँ कि हर उस को नव वर्ष कि शुभकामनायें जो गलती से मेरे इस ब्लॉग को पढ़ रहा हैं |
चलिए हुआ तो घर जा कर कुछ लिखने कि कोशिश करूँगा...
Friday, February 19, 2010

व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे

आज सोचा की अपने बारे में कुछ लिखा जाए. वो क्या है ना कि बहुत दिनों से कुछ लोग मेरे द्वारा कि गयी आलोचनाओ ध्यान दीजियेगा मेरे द्वारा कि गयी आलोचनाओ से प्रभावित हो कर मुझसे बोल रहे थे कि मैं व्यंग्य लिखना शुरू क्यों नहीं करता हूँ तो अनायास ही मैं बोल पड़ा कि "व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे" हांजी बिलकुल सही सुना आपने कि मैंने कहा कि "व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे".
अब जो लोग हमारी तरह लापता गंज के प्रशंसक है वो लोग तो कहेंगे कि लो मारा डायलाग इसने लापता गंज से चुरा कर, लेकिन दोस्त ये सही बात है कि वाकई व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे और आज हम लिखने पढने में जो भी है कही ना कही उनके कारण ही है, उनको देख कर ही हमने सिखा है कि अगर हमे अपनी बात व्यंग्यात्मक कहना है तो हम कैसे कह सकते है लेकिन मुद्दे कि बात तो ये है कि मैं तो अपनों में एक आलोचक के रूप में कुख्यात हूँ, जी आलोचक कभी प्रख्यात नहीं होते है वो तो कुख्यात होते है. सही बात है भैया आलोचना करना कोई सभ्य लोगों का काम थोड़े ही होता है.
अब वो दिन नहीं रहे कि हम बोले कि निंदक निअरे रखिये...अब तो भैया निंदक कुछ बोल कर तो देखे उसके दांत तोड़ दिए जायेंगे, वैसे एक सच ये भी है कि आज कल के निंदक भी निंदक कम जलन के कारण बोलने वाले ज्यादा हो गए है.
चलिए अब हम बंद करते है है क्योंकि पापा कसम लापता गंज का टाइम जो हो गया है.