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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे

आज सोचा की अपने बारे में कुछ लिखा जाए. वो क्या है ना कि बहुत दिनों से कुछ लोग मेरे द्वारा कि गयी आलोचनाओ ध्यान दीजियेगा मेरे द्वारा कि गयी आलोचनाओ से प्रभावित हो कर मुझसे बोल रहे थे कि मैं व्यंग्य लिखना शुरू क्यों नहीं करता हूँ तो अनायास ही मैं बोल पड़ा कि "व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे" हांजी बिलकुल सही सुना आपने कि मैंने कहा कि "व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे".
अब जो लोग हमारी तरह लापता गंज के प्रशंसक है वो लोग तो कहेंगे कि लो मारा डायलाग इसने लापता गंज से चुरा कर, लेकिन दोस्त ये सही बात है कि वाकई व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे और आज हम लिखने पढने में जो भी है कही ना कही उनके कारण ही है, उनको देख कर ही हमने सिखा है कि अगर हमे अपनी बात व्यंग्यात्मक कहना है तो हम कैसे कह सकते है लेकिन मुद्दे कि बात तो ये है कि मैं तो अपनों में एक आलोचक के रूप में कुख्यात हूँ, जी आलोचक कभी प्रख्यात नहीं होते है वो तो कुख्यात होते है. सही बात है भैया आलोचना करना कोई सभ्य लोगों का काम थोड़े ही होता है.
अब वो दिन नहीं रहे कि हम बोले कि निंदक निअरे रखिये...अब तो भैया निंदक कुछ बोल कर तो देखे उसके दांत तोड़ दिए जायेंगे, वैसे एक सच ये भी है कि आज कल के निंदक भी निंदक कम जलन के कारण बोलने वाले ज्यादा हो गए है.
चलिए अब हम बंद करते है है क्योंकि पापा कसम लापता गंज का टाइम जो हो गया है.