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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

धन्यवाद कलाम सर...

डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम नहीं रहे । २७ जुलाई  २०१५ एक ऐसा दिन है जिस दिन भारत ने एक सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रपति, एक अद्भुत वैज्ञानिक, एक महान शिक्षक और एक सरल इंसान को खोया है । मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि मैं उनके युग का हिस्सा बना हूँ । कलाम सर एक ऐसे व्यक्ति थे जिनका जीवन, जिनके विचार, जिनका व्यवहार सब कुछ प्रेरणादायी था ।
जब वो राष्ट्रपति बने थे तब मेरे मन में एक विचार आया था कि, क्या यह व्यक्ति वाकई राष्ट्रपति बनने लायक है या सिर्फ पोखरण के सफल परिक्षण का इनको इनाम दिया गया है?? फिर जब मैंने सर को पहली बार ध्यान से सुना तो मैं दंग रह गया था कि भारत में अभी भी ऐसे लोग  मौजूद है और वो इतने बड़े पद पर आ सकते है? मैं शर्मिंदा महसूस कर रहा था कि मेरा आकलन कितना गलत था ।
जब वो राष्ट्रपति थे और भारतीय राजनीति और राजनीतिज्ञों पर बेबाक टिप्पणी करते थे तब मैं हमेशा ये सोचता था कि ये व्यक्ति शायद दुबारा राष्ट्रपति न बन पाये क्योंकि ये राजनीतिज्ञों को बेबाकी से आइना दिखा देता है और हुआ भी कुछ ऐसा ही । मुझे बहुत दुःख हुआ था कि आखिर क्यों भारतीय जनता को इतना अधिकार नहीं है की वो अपना राष्ट्रपति खुद चुन सके क्योंकि अगर ऐसा होता तो आज भी वो हमारे माननीय राष्ट्रपति होते ।
सर एक कर्मशील व्यक्ति थे और उनकी हमेशा से ये इच्छा थी की उन्हें एक शिक्षक के रूप में लोग याद रखे न की एक पूर्व राष्ट्रपति के रूप में । उनकी ज्ञानार्जन की ये प्रबल इच्छा ही थी जिसके कारण वो अपने अंतिम समय में वही कर रहे थे जो वो चाहते थे । एक शिक्षक ये लिए इससे अच्छा अंत क्या हो सकता है की वो एक शिक्षण संस्थान में पढ़ाते हुए अपनी अंतिम सांस ले । जाते-जाते भी वो हमें ये शिक्षा दे गए की अगर आप अपना काम ईमानदारी से कर रहे हो तो ईश्वर भी आपकी इच्छओं का ध्यान रखता है ।
कलाम सर ने न सिर्फ हमें एक विज़न दिया है अपितु हमें उस विज़न को पाने का रास्ता भी दिखाया है । अब हमारी बारी है की हम मिल कर उनके विज़न पर काम करे और २०२० तक उनके विज़न को साकार करने की दिशा में कदम उठाएं । हम सब कुछ भले न कर पाये लेकिन ये शपथ ले की हमसे जितना हो सकेगा हम अपने देश को अपने समाज को देने की कोशिश करेंगे ।
अंततः  वो एक वट वृक्ष है जिसने अपनी शाखाओं को इतना मजबूत कर लिया है की वो कभी गिर ही नहीं पायेगा । 

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