कुछ मेरे बारे मे...

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Aditya Dubay
हर जगह ये पूछा जाता है कि अपने बारे मे बताइए (About me), हम ये सोचते है की जो हमें जानते है उन्हें अपने बारे मे बताना ग़लत होगा क्योंकि वो हमें जानते है और जो हमें नही जानते उन्हे हम बता कर क्या करेंगे की हम कौन है | जो हमें नही जानता क्या वो वाकई हमें जानना चाहता है और अगर जानना चाहता है तो उसे About me से हम क्या बताये क्योंकि हम समझते है बातचीत और मिलते रहने से आप एक दूसरे को बेहतर समझ सकते हो About Me से नही | वैसे एक बात और है हम अपने बारे मे बता भी नही सकते है क्योंकि हमें खुद नही पता की हम क्या है ? हम आज भी अपने आप की तलाश कर रहे है और आज तक ये नही जान पायें हैं की हम क्या है? अब तक का जीवन तो ये जानने मे ही बीत गया है की हमारे आस पास कौन अपना है और कौन पराया ? ये जीवन एक प्रश्न सा ज़रूर लगता है और इस प्रश्न को सुलझाने मे हम कभी ये नही सोच पाते है की हम कौन है? कुछ बातें सीखने को भी मिली जैसे आपका वजूद आपके स्वभाव या चरित्र से नही बल्कि आपके पास कितने पैसे है उससे निर्धारित होता है | कुछ लोग मिले जो कहते थे की वो रिश्तों को ज़्यादा अहमियत देते है लेकिन अंतत: ... बहुत कुछ है मन मे लिखने के लिए लेकिन कुछ बातें या यू कहें कुछ यादें आ जाती है और मन खट्टा कर जाती है तो कुछ लिख नही पाते हैं |
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कुछ तो लोग कहेंगे...

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Friday, February 19, 2010

व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे

आज सोचा की अपने बारे में कुछ लिखा जाए. वो क्या है ना कि बहुत दिनों से कुछ लोग मेरे द्वारा कि गयी आलोचनाओ ध्यान दीजियेगा मेरे द्वारा कि गयी आलोचनाओ से प्रभावित हो कर मुझसे बोल रहे थे कि मैं व्यंग्य लिखना शुरू क्यों नहीं करता हूँ तो अनायास ही मैं बोल पड़ा कि "व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे" हांजी बिलकुल सही सुना आपने कि मैंने कहा कि "व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे".
अब जो लोग हमारी तरह लापता गंज के प्रशंसक है वो लोग तो कहेंगे कि लो मारा डायलाग इसने लापता गंज से चुरा कर, लेकिन दोस्त ये सही बात है कि वाकई व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे और आज हम लिखने पढने में जो भी है कही ना कही उनके कारण ही है, उनको देख कर ही हमने सिखा है कि अगर हमे अपनी बात व्यंग्यात्मक कहना है तो हम कैसे कह सकते है लेकिन मुद्दे कि बात तो ये है कि मैं तो अपनों में एक आलोचक के रूप में कुख्यात हूँ, जी आलोचक कभी प्रख्यात नहीं होते है वो तो कुख्यात होते है. सही बात है भैया आलोचना करना कोई सभ्य लोगों का काम थोड़े ही होता है.
अब वो दिन नहीं रहे कि हम बोले कि निंदक निअरे रखिये...अब तो भैया निंदक कुछ बोल कर तो देखे उसके दांत तोड़ दिए जायेंगे, वैसे एक सच ये भी है कि आज कल के निंदक भी निंदक कम जलन के कारण बोलने वाले ज्यादा हो गए है.
चलिए अब हम बंद करते है है क्योंकि पापा कसम लापता गंज का टाइम जो हो गया है.

2 comments:

Dipti said...

सुधार की ज़रूरत है। क्योंकि व्यंग तो हमारे पिताजी लिखा करते हैं। भाई मेरे पापा अभी भी लिखते हैं उनके लिए थे मत लिखो।

Aditya Dubay said...

Sudhar ki jarurat to hai aur hona bhi chahiye lekin beta papa ab nahi likhte hai ye ek sach hai.