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सोमवार, 15 जून 2009

ये जो है ज़िन्दगी या ये घर की बात है...

हाँ जी तो बताइए की ये जो है ज़िन्दगी या ये घर की बात है? सन् १९८४ में स्वर्गीय श्री शरद जोशी द्वारा लिखित और एस एस ओबेराई एवं रमन कुमार (तारा फेम) द्वारा निर्देशित "ये जो है ज़िन्दगी" को भूल पाना थोड़ा मुश्किल काम है और हम जैसे लोग तो शायद भूलना भी नही चाहेगे हलाँकि अगर मैं अपनी बात करू तो मुझे इस धारावाहिक की बहुत धुंधली यादें है लेकिन वो यादें भी इस धारावाहिक को ना भूलने के लिए काफ़ी है।
रणजीत वर्मा (स्वर्गीय श्री शफी इनामदार)उनकी पत्नी रेणू वर्मा (स्वरुप संपत) उनका साला राजा(राकेश बेदी) उनका बॉस (टिकू तलसानिया ) और उनके बंगाली पड़ोसियों (विजय कश्यप और सुलभा आर्य ) के चारो ओर घुमती ज़िन्दगी और इन जिंदगियों को एक सूत्र में पिरोते सतीश शाह , कौन भूल सकता है इन चरित्रों को? हर कलाकार एक से बड़कर एक और ऊपर से शरद जोशी के व्यंग्य ,आख़िर क्यों भूले हम इस धारावाहिक को?
ये वही धारावाहिक है जिसने टिकू तलसानिया को "ये क्या हो रहा है ?" और सतीश शाह ने "व्हाट ऐ रिलीफ" और "तीस साल का एक्सपेरिएंस है" जैसे डाय्लोग दिए। शायद आपको जान कर आश्चर्य हो की सारे धारावाहिक में एक कैमरा सेट अप किया गया था और इस धारावाहिक के कोई पायलट एपिसोड नही थे।
अब बात करे "घर की बात है " की,वैसा ही परिवार जिसमे एक पति राजदीप याग्निक (सुमीत राघवन),एक पत्नी राधिका याग्निक (जूही बब्बर ) उनका साला काकू उर्फ़ कपिल कुमार (स्वप्निल जोशी ) और पड़ोसी मिस्टर एंड मिसेस वालिया (जयति भाटिया और देवेन मुंजाल) है और इस बार इन्हे एक सूत्र में पिरोने का काम कर रहे है अली असगर। वैसे हमे इन कलाकारों की योग्यता पर कोई शक नही है पर फिर भी इस घर की बात में वो बात नही नज़र नही आती है जो कि उस ज़िन्दगी में थी। आज के दौर में आधुनिकता तो है पर वो सादगी वो बंधन नज़र नही आता है। खैर अब तो घर कि बात भी पुरानी हो चली है, पता नही क्यों लेकिन चैनल वालों को अच्छे धारावाहिक अच्छे नही लगते है तभी तो घर कि बात है का भी हश्र भी साराभाई वर्सेस साराभाई और जस्सुबेन जयंतीलाल जोशी कि जोइंट फॅमिली जैसा ही हुआ।

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